मंगलवार, 17 मार्च 2015

रानी पद्मिनी

यह रानी पद्मिनी महल जिसके नाम से एक त्वरा उठती है, एक हुक बरबस ह्रदय को मसोस डालती है; क्या पद्मिनी महल की दर्दनाक कहानी का किसी ने और-छोर भी पाया...है? क्या फुसलाने से भी कोई व्यथा मिट सकती है? क्या सहलाने से भी दर्द समाप्त हो सकता? महल स्वंम एक कहानी-एक दर्दभरी दास्ताँ है; एक उपेक्षित किंतु महान कौम का महाकाव्य है, जो कागजों पर नही, इतिहास के भुलाये हुए महाकवियों द्वारा पत्थरों पर लिखा गया है पत्थर की लकीरों की भांति ही है-वे कहानियाँ जो न समय की आंधी से अब तक मिट सकी है और न ही विस्मृति की वर्षा से धुल सकी है 

रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बैठा
रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चितौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी उसने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया


तब उसने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि "हम तो आपसे मित्रता करना चाहते है रानी की सुन्दरता के बारे बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुंह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली लौट जायेंगे”। सन्देश सुनकर रत्नसिंह आगबबुला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि "मेरे कारण व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है" रानी को अपनी नहीं पुरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी सो उसने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अल्लाउद्दीन चाहे तो रानी का मुख आईने में देख सकता है

अल्लाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है साथ ही उसकी बदनामी होगी वो अलग सो उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया

चितौड़ के किले में अल्लाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अथिती की तरह किया
रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचों बीच था सो दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आईने के सामने बिठाया गया आईने से खिड़की के जरिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीँ से अल्लाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उसका सौन्दर्य देख देखकर अल्लाउद्दीन चकित रह गया और उसने मन ही मन रानी को पाने के लिए कुटिल चाल चलने की सोच ली जब रत्नसिंह अल्लाउद्दीन को वापस जाने के लिए किले के द्वार तक छोड़ने आये तो अल्लाउद्दीन ने अपने सैनिको को संकेत कर रत्नसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लियारत्नसिंह को कैद करने के बाद अल्लाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उसने अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा कि -"मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करे”। रानी का ऐसा सन्देश पाकर कामुक अल्लाउद्दीन के ख़ुशी का ठिकाना न रहा, और उस अदभुत सुन्दर रानी को पाने के लिए बेताब उसने तुरंत रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया

उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गयाइस तरह पूरी तैयारी कर रानी अल्लाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उसकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे अल्लाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के काफिले को दूर से देख रहे थे सारी पालकियां अल्लाउदीन के शिविर के पास आकर रुकीं और उनमे से राजपूत वीर अपनी तलवारे सहित निकल कर यवन सेना पर अचानक टूट पड़े इस तरह अचानक हमले से अल्लाउद्दीन की सेना हक्की बक्की रह गयी और गोरा बादल ने तत्परता से रत्नसिंह को अल्लाउद्दीन की कैद से मुक्त कर सकुशल चितौड़ के दुर्ग में पहुंचा दिया

इस हार से अल्लाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चितौड़ विजय करने के लिए ठान ली आखिर उसके छ:माह से ज्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण किले में खाद्य सामग्री अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया जौहर के लिए गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया रानी पद्मिनी के नेतृत्व में १६००० राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी भी हतप्रभ हो गया महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर ३०००० राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ गोरा और उसके भतीजे बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया-

बादल बारह बरस रो,
लड़ियों लाखां साथ
सारी दुनिया पेखियो,
वो खांडा वै हाथ।।

इस प्रकार छह माह और सात दिन के खुनी संघर्ष के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद असीम उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके
उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ़ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशे और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे

रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी

- स्व. विजयसिंह सोलंकी, बीकानेर

सोमवार, 16 मार्च 2015

साँसों के सन्तूर

[समीक्षित कृति-साँसों के सन्तूर (दोहा-संग्रह), दोहाकार-आचार्य भगवत दुबे, प्रकाशक-पाथेय प्रकाशन, जबलपुर]
वैसे, दोहा जैसे छोटे-छन्द में काव्य-सृजन का साहस समर्थ कवि भी संकोच से करते हैं। एक तो दोहा के लघु-आकार के कारण “अरथ अधिक अरु आखर थोरे” की अनिवार्यता रहती है, ठीक जिस तरह एक कुशल नट, कुण्डली (छोटे से घेरे) से अपने आप को समेटकर निकल जाता है। दूसरे, दोहा को “लोक” की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। एक सामान्य व्यक्ति भी दोहा पढ़/सुनकर यह कह बैठे—“वाह! कवि ने हमारे मन की बात कह दी।” इस दृष्टि से आचार्य भगवत दुबे एक सफलतम दोहाकार हैं। “साँसों के सन्तूर” उनका छटवां दोहा-संग्रह है। इसके 1038 दोहों को मिलाकर दोहाकार के 12 हजार से ऊपर दोहे प्रकाशित हो चुके हैं, जिनपर विविध शोध-कार्य प्रचलन में हैं।
रागसिध्द दोहाकार दुबेजी ने संयोग के धरातल पर अधिकांश दोहों को संस्कारित किया है। अर्थ, उक्ति-सौन्दर्य और गेयता जैसे गुणों से आप्लावित ये श्रंगारी-दोहे सहृदयों को सहज ही आकर्षण-पाश में बांध लेते हैं। प्रस्तुत दोहे में नायिका का “शरीर-सौन्दर्य” मध्यकालीन “रीति-परम्परा” का स्मरण कराता है–
पंचमुखी रुद्राक्ष से, सुन्दर सारे अंग।
प्रिये तुम्हारे रूप का, अर्चन करें अनंग।।
यही अनुरागी कवि जब रागबोध से युगबोध की ओर मुड़ता है तो बदलते मानव-मूल्य, रुग्ण होतीं हुईं सदभावनाएँ, पश्चिम का अन्धानुकरण, जाति-धर्म और वर्ण पर समाज का विभाजन, साधु-संतों-इमामों का दुहरा चरित्र, प्रदूषित-पर्यावरण इत्यादि से वह व्यथित हो जाता है एवम् ऐसे में उसकी अभिव्यन्जित काव्योक्तियां पाठकों/श्रोताओं को झकझोरतीं हैं, चिन्तन के लिए विवश करतीं हैं—
बहुत गर्म है आजकल, दुल्हों का व्यापार।
लाखों में बिकने लगे, दैनिक चौकीदार।।
अपनी दीर्घ दोहा-यात्रा के उत्तरार्ध में यह वरिष्ठ सृजन-साधक, आस्तिकता-आध्यात्मिकता से प्रभावित लगता है। देखा जावे तो, संग्रह की शुरुआत ही ‘ईश्वर पर विश्वास’ से हुई है—
साईं दीपक राग है, पातक तम हो दूर।
इनकी इच्छा से बजे, साँसों के सन्तूर।।
उक्त शीर्षक-दोहे में-कवि ने आर्य-संस्कृति में वर्णित आश्रम-व्यवस्था के शतायु जीवन (साँसों) की गणना पर आधारित शततंत्री सन्तूर की कल्पना की है, सामान्यतः सूफियाना-संगीत में प्रमुखता से प्रयुक्त इस प्राचीनतम वाद्य में 72 से 90 तार होते हैं। बाबजूद इन सबके, दोहाकार ने “दिशा देने का हितैषी अनिवार्य पक्ष भी ओझल नहीं रहने दिया”- 
वाणी पर संयम रखो, बोलो सोच-विचार।
वाणी से हों आपके, दुश्मन-दोस्त हजार।।
अगर जिन्दगी के दिवस, तुम्हें मिले हों चार।
तो क्यों कर लेते नहीं, सबसे जी भर प्यार।।
इक नन्हें से दीप ने, फैला दिया प्रकाश।
अंधियारे के हो गये, डर कर जर्जर पाश।।
इस एकहजारी दोहा-माला में ठलुए, दडवे, वज्जाद जैसे सामान्य बोल-चाल के शब्द, बेईमानी पुज रही, खेतों में उगने लगे अब लोहे के वृक्ष, पुण्यों की बछिया जैसे नये मुहावरे, शरद की रात में सितारों का चन्द्रमा की बारात लेकर निकलना, जुगनुओं की पूँछ पर् मशालों से घने तिमिर का भाल ठनकना जैसे सुन्दर उपमानों और अन्ना हजारे का आधुनिक-आदर्श (रौल-माडल) में प्रतीकात्मक प्रयोग यह सिध्द करता है कि आचार्य जी अब उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ उन्हें पद-प्रतिष्ठा-पैसा-मान-सम्मान कोई महत्त्व नहीं रखता। वे एक सच्चे कर्मयोगी की भांति साहित्य-साधना रत हैं। वे अपने कमाये अनुभवों और अनुभूतियों को दोनों हाथों से उलीच रहे हैं। उनकी सोच, उनके सामाजिक सरोकार, उनका सत्य के पक्ष में डटकर खड़े रहना और अपनी बात को निर्भीकतापूर्वक कहना-उन्हें कबीर की पांत में बिठा देता है।
और, जैसा कि आचार्य ने आत्मनिवेदित किया है—
रोज कलम घिसते रहे, गोदे पृष्ठ हजार।
दोहा लिख पाया मगर, मुश्किल से दो-चार।।
हम तो यही कहेंगे—“आचार्य जी! धैर्य धारण करें!! यथाशीघ्र, ये ही दो-चार दोहे आम-कहन का हिस्सा बनेंगे, लोगों की जुबान पर थिरकेंगे और तब- आपका श्रम एवम् सृजन सार्थक होगा”।

रविवार, 8 मार्च 2015

(पु.) भ्रूण हत्या

सुबह-सुबह पत्नी मीना और घर की काम वाली बाई के मध्य तेज बातचीत से नींद खुल गई। न जाने! दोनों के बीच किस विषय पर विमर्श चल रहा था? वैसे, बाई तीन-चार दिनों से काम पर नहीं आ रही थी। शायद, वह न आ पाने का स्पष्टीकरण दे रही थी। “एक तो वा एलगिन खूबइ दूर बरत है। गोडे टूट गये जावे-आवे में। मेट्रो पच्चीस रुपइया लेत एक तरफ के, एक आदमी के।”
थोडा-थोडा माजरा समझ आया कि काम वाली की बहू गर्भवती थी। उसे एल्गिन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्रसूति हो चुकी है और सूतक में न आने के कारण वह छुट्टी माँग रही थी। लेकिन आश्चर्य तब हुआ, जब वह बीच-बीच में अपनी बहू को कोस रही थी। “ऐ, बाई-साब! का बतावें। सबरी उम्मीदों पे पानी फिर गओ। ऊपर से चार घरों के काम को हरजा भओ। त्यौहार को टेम हतो। छुट्टी के लाने सबइ बाई-साहिबें नाक-भों सिकोड़त हैं वकीलन बाई ने तो चार दिना के पैसा काट लये। बहुतइ कठोर हें वे!” इसके पहले वह और भला-बुरा कहती, मीना ने उसे टोक दिया कि अभी साहब सो रहे हैं। बाई का स्वर मन्द पड़ गया। मैं फिर सोने की कोशिश करने लगा।
बातचीत लगभग कानाफूसी में बदल गयी थी। तभी ऐसा लगा कि कामवाली रो रही है, मीना उसे समझा रही थी – कामवाली की बुझी-बुझी आवाज ने मुझे बाह्य-बार्तालाप पर कान लगाने के लिए बाध्य कर दिया। बाई कह रही थी—“हमने तो तीसरे महिना डाक्टरी जाँच करवावे को कही हती। पे बहुरानी नहीं मानी, हमइ बात मान लेती तो।” एक झटका सा लगा, मैं बिस्तर से उठ गया, लेकिन मेरी उठने की आहट ने बाई-पुराण पर विराम लगा दिया। मैंने देखा, कि बाई आंगन में बर्तन मांज रही थी; उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। बर्तनों की खडबड़ाहट बता रही थी कि बाई के अन्दर एक ज्वालामुखी दबा है, जो कभी भी फट सकता है। रसोईघर के दरवाजे पर बैठी मीना उसे लड़की और लड़के की बराबरी का दर्शन समझा रही थी और साथ-ही पिछले महीने बर्तनवाला पाउडर ज्यादा खर्च हुआ, उसकी कैफियत भी माँग रही थी। गुसलखाने में जाते-जाते मुझे समझ आ चुका था कि बाई की पतोहू ने लड़की जनी है और शायद, वही आदम-समस्या—लड़के की ललक।
नित्य-क्रियाओं से निवृत होकर जब मैं गुसलखाने से बाहर आया,तब तक बाई काम निपटा कर जा चुकी थी। मीना चाय रखे मेरा इंतजार कर रही थी। उसके चेहरे के आते-जाते भाव यह बता रहे थे कि कोई तो बात है, जो उसे खाये जा रही है। अखबार की तहें अभी खुली नहीं थीं; गोया देश-विदेश की कोई घटना उसकी चिंता का कारण हो, वैसे भी मीना को प्रिन्टिंग इंक की गंध अच्छी नहीं लगती। इसलिए वह बासा अखबार ही पड़ती है। बाई की पोती की खबर इतना संवेदनशील मुद्दा नहीं था; क्योंकि वह लड़की और लड़के में बुनियादी अन्तर नहीं मानती, यहाँ तक कि लड़के और बहू में भी नहीं। फिर क्या, बाई से उसे मोहल्ले-पड़ोस की कोई भेद-भरी खबर मिली हो, जिसे सुनाने की उत्सुकता हो।
चाय की प्रथम चुस्की के साथ मैंने उसकी चुप्पी को तोडा और सीधे-सीधे काम वाली बाई के हाल-चाल पूंछ बैठा। बस! फिर क्या था, बदलते ज़माने और उसके दस्तूरों का हवाला देते हुए उसने रहस्योद्घाटन किया। हुआ यूँ, बाई की बहू को जचकी हेतु सरकारी प्रसूतिकागृह में भर्ती कराया गया। वहाँ अच्छी घडी-बेला में एक स्वस्थ बालक का जन्म हुआ। डिलेवरी नार्मल हुई। कोई मूल या दोष भी नहीं। -“बाई के पोता हुआ। पोती नहीं। फिर भी वह इतनी परेशान क्यों थी?” मेरे पूँछे जाने पर मीना ने बताया ladli laxmi–“कामवाली बाई और उसके घरवाले चाहते थे कि उनकी पुत्रवधू लड़की जने। लड़का नहीं। यदि वह लड़की जनती तो अस्पताल का सारा खर्च, दवा-दारू, एम्बुलेंस, गुड़-बिस्वार, ‘लाडली-लक्ष्मी’ योजना के अंतर्गत लड़की का बीमा,हर महीने उसकी देख-रेख के लिये नगद राशि एवम अलग-अलग सुविधाएँ। लड़की की पढाई-लिखाई, उसकी ड्रेस, उसकी खाना-खुराक, उसके लिए साईकिल। ऊपर से हर महीने स्कालरशिप का पैसा अलग से। यदि लड़की हायर शिक्षा लेना चाहे,तो कोचिंग हेतु लोन-सुविधा, जिसके चुकाने के लिए उसकी या उसके घरवालों की कोई जिम्मेदारी नहीं। वयस्क होने पर उसकी शादी, दहेज़ और कन्यादान की कोई चिंता नहीं। यह सभी उसके मामा मुख्य-मंत्री करते हैं। लड़कियों को बराबरी का हक, दर्जा और नौकरी भी। सरकार निकट भविष्य में ऐसे परिवारों को पेंशन देने पर विचार कर रही है, जिनमें सिर्फ लड़कियां हैं। अब चूंकि लड़का हुआ है, इसलिए कोई अतिरिक्त सुविधाएँ नहीं। गरीबी- रेखा का कार्ड लगाकर जो मिल सका, बस! बाकी गांठ से। कामवाली इसलिए रो रही थी। बता रही थी कि उसका लड़का यह खबर सुनकर बिना जच्चा-बच्चा से मिले मद्रास ट्रक लेकर चला गया, आठ दिनों में लौटेगा। आज अस्पताल से बहू की छुट्टी हुई है, और सास काम पर आ गई। भगवान जाने! क्या करती होगी, वह प्रसूता?”
Ladli Laxmi  Yojna Scheme
चित्र: ladlilaxmi.com 
और, मुझे रह-रह कर कामवाली का बुझा स्वर सुनाई दे रहा था—“हमने तो तीसरे महीना डाक्टरी जाँच करवावे को कही हती, पे बहुरानी नई मानी।” काश! बाई की पतोहू गर्भधारण के तीसरे महीने भ्रूण-परीक्षण करवा लेती और जाँच से जब यह पता चलता कि उसकी कोख में एक बालक पल रहा है- तब, तब क्या बाई और उसके परिजन, गर्भपात करवा देते? (पु.) भ्रूण-हत्या का विचार आते ही मैं विचलित हो गया

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

हमारी लोक संपदा- ईसुरी की फागें

भारत विविधवर्णी लोक संस्कृति से संपन्न, समृद्ध परम्पराओं का देश है। इन परम्पराओं में से एक लोकगीतों की है।

ऋतु परिवर्तन पर उत्सवधर्मी भारतीय जन गायन-वादन और नर्तन की त्रिवेणी प्रवाहित कर आनंदित होते Lok geetहैं। फागुन वर्षांत तथा चैत्र वर्षारम्भ के साथ-साथ फसलों के पकने के समय का सूचक भी है। दक्षिणायनी सूर्य जैसे ही मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायणी होता है इस महाद्वीप में दिन की लम्बाई और तापमान दोनों की वृद्धि होने की लोकमान्यता है। सूर्य पूजन, गुड़-तिल से निर्मित पक्वान्नों का सेवन और पतंगबाजी के माध्यम से गगनचुम्बी लोकानंद की अभिव्यक्ति सर्वत्र देख जा सकती है। मकर संक्रांति, खिचड़ी, बैसाखी, पोंगल आदि विविध नामों से यह लोकपर्व सकल देश में मनाया जाता है।

पर्वराज होली से ही मध्योत्तर भारत में फागों की बयार बहने लगती है। बुंदेलखंड में फागें, बृजभूमि में नटनागर की लीलाएँ चित्रित करते रसिया और बधाई गीत, अवध में राम-सिया की जुगल जोड़ी की होली-क्रीड़ा जन सामान्य से लेकर विशिष्ट जनों तक को रसानंद में आपादमस्तक डुबा देते हैं। राम अवध से निकलकर बुंदेली माटी पर अपनी लीलाओं को विस्तार देते हुए लम्बे समय तक विचरते रहे इसलिए बुंदेली मानस उनसे एकाकार होकर हर पर्व-त्यौहार पर ही नहीं हर दिन उन्हें याद कर 'जय राम जी की' कहता है। कृष्ण का नागों से संघर्ष और पांडवों का अज्ञातवास नर्मदांचली बुन्देल भूमि पर हुआ। गौरा-बौरा तो बुंदेलखंड के अपने हैं, शिवजा, शिवात्मजा, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोभवा आदि संज्ञाओं से सम्बोधित आनन्ददायिनी नर्मदा तट पर बम्बुलियों के साथ-साथ शिव-शिवा की लीलाओं से युक्त फागें गायी जानीं स्वाभाविक है।

बुंदेली फागों के एकछत्र सम्राट हैं लोककवि ईसुरी। ईसुरी ने अपनी प्रेमिका 'रजउ' को अपने कृतित्व में अमर कर दिया। ईसुरी ने फागों की एक विशिष्ट शैली 'चौघड़िया फाग' को जन्म दिया। हम अपनी फाग चर्चा चौघड़िया फागों से ही आरम्भ करते हैं। ईसुरी ने अपनी प्राकृत प्रतिभा से ग्रामीण मानव मन के उच्छ्वासों को सुर-ताल के साथ समन्वित कर उपेक्षित और अनचीन्ही लोक भावनाओं को इन फागों में पिरोया है। रसराज शृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्ष इन फागों में अद्भुत माधुर्य के साथ वर्णित हैं। सद्यस्नाता युवती की केश राशि पर मुग्ध ईसुरी गा उठते हैं-

ईसुरी राधा जी के कानों में झूल रहे तरकुला को उन दो तारों की तरह बताते हैं जो राधा जी के मुख चन्द्र के सौंदर्य के आगे फीके फड़ गए हैं-

कानन डुलें राधिका जी के, लगें तरकुला नीके
आनंदकंद चंद के ऊपर, तो तारागण फीके

ईसुरी की आराध्या राधिका जी सुंदरी होने के साथ-साथ दीन-दुखियों की दुखहर्ता भी हैं-

मुय बल रात राधिका जी को, करें आसरा की कौ
दीनदयाल दीन दुःख देखन, जिनको मुख है नीकौ

पटियाँ कौन सुगर ने पारी, लगी देहतन प्यारी
रंचक घटी-बड़ी है नैयाँ, साँसें कैसी ढारी
तन रईं आन सीस के ऊपर, श्याम घटा सी कारी
'ईसुर' प्राण खान जे पटियाँ, जब सें तकी उघारी

कवि पूछता है कि नायिका की मोहक चोटियाँ किस सुघड़ ने बनायी हैं? चोटियाँ जरा भी छोटी-बड़ी नहीं हैं और आती-जाती साँसों की तरह हिल-डुल रहीं हैं। वे नायिका के शीश के ऊपर श्यामल मेघों की तरह छाईं हैं। ईसुरी ने जब से इस अनावृत्त केशराशि की सुंदरता को देखा है उनकी जान निकली जा रही है।

ईसुर की नायिका नैनों से तलवार चलाती है-

दोई नैनन की तरवारें, प्यारी फिरें उबारें
अलेपान गुजरान सिरोही, सुलेमान झख मारें
ऐंच बाण म्यान घूँघट की, दे काजर की धारें
'ईसुर' श्याम बरकते रहियो, अँधियारे उजियारें

तलवार का वार तो निकट से ही किया जा सकता है नायक दूर हो तो क्या किया जाए? क्या नायिका उसे यूँ ही जाने देगी? यह तो हो ही नहीं सकता। नायिका निगाहों को बरछी से भी अधिक पैने तीर बनाकर नायक का ह्रदय भेदती है-

छूटे नैन-बाण इन खोरन, तिरछी भौंह मरोरन
नोंकदार बरछी से पैनें, चलत करेजे फोरन

नायक बेचारा बचता फिर रहा है पर नायिका उसे जाने देने के मूड में नहीं है। तलवार और तीर के बाद वह अपनी कातिल निगाहों को पिस्तौल बना लेती है-

अँखियाँ पिस्तौलें सी करके, मारन चात समर के
गोली बाज दरद की दारू, गज कर देत नज़र के

इतने पर भी ईसुरी जान हथेली पर लेकर नवयौवना नायिका का गुणगान करते नहीं अघाते-

जुबना कड़ आये कर गलियाँ, बेला कैसी कलियाँ
ना हम देखें जमत जमीं में, ना माली की बगियाँ
सोने कैसे तबक चढ़े हैं, बरछी कैसी भलियाँ
'ईसुर' हाथ सँभारे धरियो फुट न जावें गदियाँ

लोक ईसुरी की फाग-रचना के मूल में उनकी प्रेमिका रजऊ को मानती है। रजऊ ने जिस दिन गारो के साथ गले में काली काँच की गुरियों की लड़ियों से बने ४ छूँटा और बिचौली काँच के मोतियों का तिदाने जैसा आभूषण और चोली पहिनी, उसके रूप को देखकर दीवाना होकर हार झूलने लगा। ईसुरी कहते हैं कि रजऊ के सौंदर्य पर मुग्ध हुए बिना कोई नहीं रह सकता।

जियना रजऊ ने पैनो गारो, हरनी जिया बिरानो
छूँटा चार बिचौली पैरें, भरे फिरे गरदानो
जुबनन ऊपर चोली पैरें, लटके हार दिवानो
'ईसुर' कान बटकने नइयाँ, देख लेव चह ज्वानो

ईसुरी को रजऊ की हेरन (चितवन) और हँसन (हँसी) नहीं भूलती। विशाल यौवन, मतवाली चाल, इकहरी पतली कमर, बाण की तरह तानी भौंह, तिरछी नज़र भुलाये नहीं भूलती। वे नज़र के बाण से मरने तक को तैयार हैं, इसी बहाने रजऊ एक बार उनकी ओर देख तो ले। ऐसा समर्पण ईसुरी के अलावा और कौन कर सकता है?

हमख़ाँ बिसरत नहीं बिसारी, हेरन-हँसन तुमारी
जुबन विशाल चाल मतवारी, पतरी कमर इकारी
भौंह कमान बान से तानें, नज़र तिरीछी मारी
'ईसुर' कान हमारी कोदी, तनक हरे लो प्यारी

ईसुरी के लिये रजऊ ही सर्वस्व है। उनका जीवन-मरण सब कुछ रजऊ ही है। वे प्रभु-स्मरण की ही तरह रजऊ का नाम जपते हुए मरने की कामना करते हैं, इसलिए कुछ विद्वान रजऊ को सांसारिक प्रेमिका नहीं, आद्या मातृ शक्ति को उनके द्वारा दिया गया सम्बोधन मानते हैं:

जौ जी रजऊ रजऊ के लाने, का काऊ से कानें
जौलों रहने रहत जिंदगी, रजऊ के हेत कमाने
पैलाँ भोजन करैं रजौआ, पाछूँ के मोय खाने
रजऊ रजऊ कौ नाम ईसुरी, लेत-लेत मर जाने

ईसुरी रचित सहस्त्रों फागें चार कड़ियों (पंक्तियों) में बँधी होने के कारन चौकड़िया फागें कही जाती हैं। इनमें सौंदर्य को पाने के साथ-साथ पूजने और उसके प्रति मन-प्राण से समर्पित होने के आध्यात्मजनित भावों की सलिला प्रवाहित है।

रचना विधान

ये फागें ४ पंक्तियों में निबद्ध हैं। हर पंक्ति में २ चरण हैं। विषम चरण (१, ३, ५, ७ ) में १६ तथा सम चरण (२, ४, ६, ८) में १२ मात्राएँ हैं। चरणांत में प्रायः गुरु मात्राएँ हैं किन्तु कहीं-कहीं २ लघु मात्राएँ भी मिलती हैं। छंद प्रभाकर नरेंद्र है। इस छंद में खड़ी हिंदी में रचनाएँ मेरे पढ़ने में अब तक नहीं आयी हैं। ईसुरी की एक फाग का खड़ी हिंदी में रूपांतरण देखिए:

किस चतुरा ने चोटी गूँथी, लगतीं बेहद प्यारी
किंचित छोटी-बड़ी न उठ-गिर, रहीं साँस सम न्यारी
मुकुट समान शीश पर शोभित, कृष्ण मेघ सी कारी
लिये ले रही जान केश-छवि, जब से दिखी उघारी

नरेंद्र छंद में एक चतुष्पदी देखिए-

बात बनाई किसने कैसी, कौन निभाये वादे?
सब सच समझ रही है जनता, कहाँ फुदकते प्यादे?
राजा कौन? वज़ीर कौन?, किसके बद-नेक इरादे?
जिसको चाहे 'सलिल' जिता, मत चाहे उसे हरा दे

- संजीव सलिल

सरकार की पहल: LPG सब्सिडी

सरकार द्वारा निर्धारित आधार कार्ड को एलपीजी कनेक्शन से जोड़ने की समय सीमा २८ फ़रवरी को समाप्त हो चुकी है  सरकारी आंकड़ों को माने तो ८० फ़ीसदी एलपीजी धारकों ने इस पहल योजना के तहत अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया
अब आगे क्या? हम ग्राहकों को कैसे पता चले कि सब्सिडी बैंक अकाउंट में जमा हुई है या नहीं?
एक तरीका तो है कि बैंक के स्टेटमेंट से चेक करें इसके अलावा sms द्वारा भी ग्राहकों को सूचित किया जाता है
किन्तु क्या आपको पता है कि एक वेबसाइट में रजिस्ट्रेशन करा के आप आपके द्वारा मुहैय्या किये एलपीजी सिलिंडर का पूरे दो साल का इतिहास देख सकते हैं इसके अलावा इस वेबसाइट पर सिलिंडर बुकिंग, पिछले सिलिंडर के भुगतान संबंद्धि, सब्सिडी के भुगतान की स्थिति आदि की जानकारी भी उपलब्ध है

१. ऑनलाइन अकाउंट बनाने के लिए पहले एलपीजी कम्पनी में कागज़ी कार्यवाही संपूर्ण होनी चाहिए
२. सबसे पहले http://www.mylpg.in/ वेबसाइट पर जाइए अगर आपको अपनी एलपीजी id मालूम है तो उसे दिए हुए स्थान पर अंकित करें

३. अन्यथा अपने एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर (Bharatgas, HP या Indane) के सिलिंडर पर क्लिक करें
४. इसके पश्चात अपने डिस्ट्रीब्यूटर को दिए गए लिस्ट से सेलेक्ट करें, अपना Consumer No (जो आपकी सिलिंडर रिसीप्ट अन्यथा सिलिंडर पुस्तिका में उपलब्ध होगा) डालकर Proceed पर क्लिक करें
५. अब आपको अपना LPG ID ज्ञात हो जाएगा जिसे पुनः http://www.mylpg.in/ साईट पर रिक्त खानों में अंकित करें तथा Submit पर क्लिक करें
६. नए प्रस्तुत पेज पर New User Registration पर क्लिक कर के अपनी सही-सही जानकारी (email id, मोबाइल नंबर आदि) भरें
७. तत्पश्चात रजिस्टर्ड email id पर एक verification मेल आएगा उसमे दिए हुए लिंक पर क्लिक कर के आपका अकाउंट रजिस्टर हो जाएगा
८. दिए हुए email id एवं पासवर्ड से अपने एलपीजी विक्रेता की साईट (दिए हुए चित्र को देखें) पर लॉग इन करें
९. लॉग इन करने पर आपको कई जानकारी एवं सुविधा मिलेगी पेज की बायीं तरफ Subsidy transferred पर क्लिक कर के भुगतान की जा चुकी सब्सिडी की स्थिति ज्ञात हो सकेगी
सरकार की इस पहल का लाभ उठायें