शनिवार, 28 मार्च 2015

कुछ खट्टी-मीठी यादें

बनारस होते हुए काठमांडू की यात्रा की। पशुपति-नाथ, स्वयंभू-नाथ और गोरखनाथ के दर्शन कर वहां की ‘एस्क्लेतेड लाइफ स्टाइल’ (एक पायदान पर खड़े होकर मंजिल तक पहुंचना) का अध्ययन किया। पांच सितारा होटल, सजे-धजे केशिनो, टेक्सी में चलती दुनिया की बेहतरीन कारें, इलेक्ट्रिक बस रूट, खुबसूरत बाज़ार, रायल पैलेस, साँस्कृतिक विरासत भक्तपुर स्मृति-पटल पर आज भी चलचित्र की भांति दिखाई देते हैं।

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव पोखरा था। पोखरा, काठमांडू से 200 किलोमीटर दूर पर्वतराज हिमालय की गोद में समुद्र-सतह से 900 मीटर ऊपर स्थित सुरम्य पयर्टन-स्थल है। यह रास्ता हमलोगों {मैं, मीना (पत्नी), सौरभ, ऋषि, अबीर (पुत्र), वीरेन्द्र (भतीजा)} ने बस द्वारा तय किया। रास्ता पहाड़ी एवम दुर्गम था। संकेत-सूचक विहीन घुमावदार रास्तों पर बस चलाने में चालक अभ्यत था। पहाड़ों पर झुलेदार पध्दति से खेती, मृदा-संरक्षण के लिए बनाये गये स्टेप्स और रहवासी मकान (सामान्यतः कच्चे दुछत्ती, ऊपर का हिस्सा लकड़ी से तथा छत घास, टिन या कवेलू युक्त-समुचित ढाल के साथ) मनुष्य का प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर रहा था। बस की खिड़की के करीब बैठकर सुदूर बर्फ से आच्छादित हिमगिरी की चोटियों का सुन्दर दृश्य कवि की कल्पना सा प्रतीत हो रहा था। बर्फीली हवाओं के थपेड़े चेहरे से टकराकर झुरझुरी सी पैदा कर रहे थे। मन अत्यन्त उमंग से भर उठा था। निश्चय ही,  यह यात्रा जीवन की बिरली यात्राओं में से एक थी।

पोखरा में हम होटल डायमण्ड में रुके। होटल की छत से 4.5 वर्ग किलोमीटर में फैली प्रसिध्द फेवा झील तथा हिमालय का ऊँचा कंगुरा फिश-टेल का सुन्दर नज़ारा दिखाई देता था।  हमने प्रकृति के सुन्दरतम स्वरूप को नमन किया। शाम को झील में  नौका-विहार किया,  झील के मध्य से अन्नपूर्णा के ललामी हिम-शिखर स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। क्षितिज की मध्दिम रोशनी में फेवा झील, उसमें पड़ती पहाड़ों की प्रतिच्छाया, झील को घेरे वन और टापू पर बने बहराई देवी मंदिर का दृश्य रमणीय लगे। बीच-बीच में कुछ जल-जन्तु ऊपर सतह पर आकर झांकते नज़र आते, ठीक वैसे,  घर में आये अपरिचितों को देख छोटे बच्चे दरवाजे या परदे की ओट में छिपकर देखते हैं, और पहचान बनाने तथा घर में अपना अस्तित्व जतलाने का प्रयास करते हैं। इसी बीच एक ऐसी घटना घटी, जिसने हम सभी को विचलित कर दिया। हुआ यह, सौरभ ने झील में बहती एक जलकुम्भी पकड़ी- उसमें मछुआरों द्वारा डाला गया जाल बंधा था- जिससे नाव उलझ गयी।  नाविक के चेहरे पर उभरी चिंता की लकीरें परिस्थिति की गंभीरता को स्पष्ट कर रहीं थीं। अनुभवी नौचालक ने हमें सुरक्षित किनारे तक पहुंचा दिया। थैंक्स गॉड! बाल-बाल बचे।

झील पर टहलते समय एक बंगभाषी परिवार मिला। कोलकाता से आकर उन्होंने अपनी पोखरा से प्रारम्भ की थी। बातचीत से निजता बढ़ी। परदेश में अपनों की आत्मीयता और मृदुल व्यवहार से हम अभिभूत हुए। “पोखरा भ्रमण कैसे करें?” ‘काठमांडू का कार्यक्रम कैसे बनायें?’ इत्यादि आदान-प्रदान हुआ।

रात्रि–भोज के बाद सुपर-मार्केट की सड़कों पर चहलकदमी की और अगली सुबह के लिए टेक्सी तय की। मोलभाव के बाद होटल द्वारा नियत दर से आधे में टेक्सी मिल गई। टेक्सी चालक ने बताया कि होटल के माध्यम से बुलाने पर उसे तो उतना ही मिलता। “सुबह 5:30 बजे होटल पर टेक्सी पहुँच जाएगी”- टेक्सी ड्राइवर ने आश्वत किया। दिन भर की थकान, खट्टे-मीठे अनुभव एवम मनोरंजन की चर्चा करते हुए योजना बनी कि सुबह ज्यादा ठण्ड होने से ऋषि और अबीर को सोने दिया जायेगा। सन राइज के बाद शेष भ्रमण में वे साथ रहेंगे।

अगली सुबह, 4:30 बजे—तापमान 4 ड्रिग्री के आसपास। एक झटके के साथ ऋषि और अबीर उठकर बैठ गये। लगा, वे रात भर सोये नहीं! वे हमसे पहले तैयार हो गये। ठीक 5:30 बजे। होटल कंपाउंड में किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई। छत से झांक कर देखा तो- “गुड मार्निग! गाड़ी आ गया, साब”। सुनाई दिया। अपने आप को सहेजते हुए हम लोग टेक्सी में बैठ गये।

लगभग रात ही थी। जब टेक्सी सुनसान रास्ते से गुजरती तो कुत्ते भौंकने लगते। परन्तु एक उमंग, एक कौतुहल। 2000 फीट की सीधी चढ़ाई के बाद हम लोग 6:25 बजे उस स्थान पर पहुंचे, जहाँ से सूर्योदय देखना था। टेक्सी से उतरते ही एक ग्यारह-बारह वर्ष का नेपाली लड़का आया और बोला—“गाइड चाहिए”? “क्या बतलायेगा”? पूछने पर उत्तर मिला-‘हिमालय की चोटियाँ दिखाऊंगा, वन हंड्रेड आई सी लगेगा’—मेरे “टेन रुपीज एन सी” बोलने पर वह पीछे पड़ गया। पचास, चालीस करते-करते वह बीस रुपया आई सी तक आ गया। हम लोग ‘पोखरा वियु प्वाइंट’ के नजदीक थे। अपनी दाल न गलते देख उसने ऊपर से आ रहे एक हमउम्र को ‘बीस रुपया आई सी’ कहते हुए वापिसी ली। ऐसा लगा जैसे कोई ठगराज हमारा पीछा कर रहा था, उसकी सीमा समाप्त होने पर उसने अपना शिकार आगे वाले को सौंप दिया। हम लोग हंसे बिना न रह सके।

बीती रात आसमान साफ था, अतः हिमगिरी का रजत-सौन्दर्य सहज दिखाई दे रहा था। कडकडाती सर्दी के बाद भी बहुत से सैलानी- सभी अपने कैमरे, वीडियो, दूरबीन तैयार कर भुवन-भास्कर की अगवानी में खड़े थे। एकाएक याद आई अन्जिलो सिकेलियानो की कविता-
सूर्योदय रुका हुआ है।
सूरज को मुक्त करो
ताकि संसार में प्रकाश हो
देखो उसके रथ का चक्र कीचड़ में फंस गया है
आगे बढ़ो साथियों
सूरज के लिए यह सम्भव नहीं,
कि वह अकेला उदित हो।

6 बजकर 40 मिनिट पर मुर्गे की बांग सुनाई दी और पूर्व दिशा से पौ फटने लगी। अचरज हुआ! सूर्योदय का इतना सटीक समय, इस प्राणी ने किस घडी से मिलाया? प्राची में सूर्य की एक हलकी सी झलक के साथ सैकड़ों फ्लेश चमकने लगीं। स्वस्थ, तरोताजा, आबनूस सा दमकता सूर्य ऊपर आ रहा था।

प्रकृति–प्रेमियों ने इसे अपना एहलौकिक सुख माना जबकि धर्म–प्रियजन इस ईश्वरत्व को स्वीकार प्रातः-वंदना करने लगे। उदयाचल में सूर्य का स्वरूप सामने आते –आते अरुणिमा और ऊष्मा का संचार होने लगा, साथ ही सुदूर उत्तर में अवस्थित धौलगिरी, फिशटेल और अन्नपूर्णा के शिखरों पर लदी बर्फ का रंग सुनहरा होने लगा। हिमराशी के दुग्ध –धवल सौन्दर्य में सुनहली आभा का दृश्यावलोकन ही इस वियु प्वाइंट का आकर्षण है। हम सभी प्रकृति का इतना सहज एवम लुभावना परिवर्तन देखकर मन्त्र–मुग्ध से खड़े रहते, यदि सह–सैलानी की तेज आवाज ध्यान–भग्न न करती; वे किसी पर नाराज हो रहे थे– “तुम्हें तो ठीक से पर्वत-शिखरों के नाम नहीं मालूम, फिर बीस रुपया किस बात का दूँ”। मैंने देखा यह वही बालक है, जिसने हम लोगों को अपने हमजोली के हाथ ‘बीस रुपया आई सी’ कहते हुए सौंपा था। बालक होशियार था, सफल गाइड के गुण पालने में ही दिख रहे थे।

हम दीप्तिमान दृश्यावलियों को हृदयंगम कर वापिस लौटे। चाय–नाश्ता के बाद पोखरा के अन्य दर्शनीय स्थल-विंध्यवासिनी देवी का मंदिर, महेंद्र गुफा, सेती गार्ज, देवी फाल तथा नेचुरल म्यूजियम देखे। रात्रि में नेपाली सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वहाँ के परम्परागत नृत्य, गीत संगीत का आनंद उठाया। बच्चे अत्याधिक खुश थे। हमें भी संतोष था कि यदि सुबह ऋषि और अबीर को साथ न लिया होता तो वे एक ऐसा मौका गँवा देते जिसे शायद हम सभी कभी न भूल सकेंगे।

रविवार, 29 जून 2014

श्रीनगर-काश! उनके अच्छे दिन जल्दी आ जाते।

श्रीनगर, भारत के शीर्षस्थ सीमांत-प्रदेश जम्मू और कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। श्रीनगर (श्री+नगर) का शाब्दिक अर्थ-वैभव की नगरी है। वहाँ का नेचर (प्रकृति) और नेचुरल ब्यूटी (दमकते चेहरे) देखते ही बनते हैं। लगता है, कुदरत ने उन्हें फुर्सत से गढ़ा है। किंवदन्ती यह भी है कि एक समय वहाँ के बहुसंख्यक लोग (कश्मीरी पंडित) ईश्वर को अपना लाभांश देते थे और उतनी स्वर्ण-मुद्राएँ वहाँ स्थित झील (डल झील का आरम्भिक हिस्सा गोल्डन-लेक कहलाता है) में डाल देते थे। यह अलग बात है कि आज वे अपने ही घरों से बेघर हैं? वैसे, मोदी सरकार कश्मीरी-पंडितों के पुनर्स्थापन के लिए कृत-संकल्पित है। काश! उनके अच्छे दिन जल्दी आ जाते।
इतिहासकार मानते हैं कि श्रीनगर, मौर्य संम्राट अशोक द्वारा बसाया गया। अन्य पर्वतीय शहरों की तुलना में यह शहर कुछ अलग लगता है। यहाँ के घर और बाजार पहाड़ी ढलानों पर नहीं बसे। एक विस्तृत घाटी के मध्य होने के कारण यह मैदानी शहरों जैसा है। किन्तु पृष्ठभूमि में दिखाई पड़ते बर्फाच्छादित पर्वत-शिखर यह अहसास कराते हैं कि हम वास्तव में समुद्रतल से 1730 मीटर ऊँची सैरगाह में हैं।
श्रीनगर को याद करें तो याद आते हैं वहाँ के सूखे मेवे, स्वादिष्ट फल, सुगन्धित केशर, सुपाच्य पेय कहवा, सुन्दर परम्परागत हस्तशिल्प, खूबसूरत डल झील और मुग़ल स्थापत्य शैली के बाग-बगीचे। "सिटी ऑफ़ गार्डन्स" के नाम से मशहूर इस शहर में छोटे-बड़े 700 बगीचे हैं।
कश्मीर का ट्यूलिप-गार्डन पूरे साल में मात्र पच्चीस दिन खुलता है। पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की स्मृति संजोये यह बॉटनिकल गार्डन 90 एकड़ क्षेत्र में विकसित है। 23 अप्रैल दोपहर को जब हम वहाँ थे, तब लगभग 70 किस्मों के ट्यूलिप खिले थे। अलग-अलग रंग के, अलग-अलग ढंग के, अलग-अलग कतारों में। दूर तक, जहाँ भी निगाह दौड़ती, एक से बढ़कर एक गुल खिले दिखते। 'नन्दन -कानन' जैसी दिव्यता देखकर हम दंग रह गए। लगा, श्रीनगर आना सार्थक हुआ। पाँव-पाँव घूमते हुये हम थक गये, परन्तु बगीचे का कोई  ओऱ-छोर नहीं पकड़ पाये। भूख भी लग रही थी। पुए खाकर कहवा पिया, परम्परागत परिधानों में फोटो खिंचवाए और उस सपनों के संसार से बाहर आ गये।
यहाँ एक गड़बड़ हो गई। कश्मीर के शाही बगीचे (मुग़ल बादशाहों के ख्बाब गाह) हमने ट्यूलिप गार्डन के बाद देखे। एक औपचारिकता सी निभाते हुये। फिर भी, 'चश्म-ए-शाही' में सोतों से निकलते शीतल स्वादिष्ट जल का स्वाद और 'शालीमार' में चिनार वृक्षों के बैक-ग्राउंड में लिए फोटोग्राफ्स हमारी निजी धरोहर  हैं।
कश्मीर यात्रा का अंतिम और अहम पड़ाव था -डल झील। श्रीनगर के मुकुट पर जड़ा बेशकीमती नगीना। जब हमने सुन्दर, सजी-धजी पैडल टेक्सी बोट (शिकारा) किराये पर लेकर झील में प्रवेश किया, तब भगवान भाष्कर अस्ताचल की ऒर थे। आकाश का नारंगी रंग समूची झील को अपने रंग में रंग रहा था। यहाँ की शान्त, स्तब्ध झील में नौकायन, भेड़ाघाट (जबलपुर) में किये नौका-बिहार से पृथक अनुभव रहा। यहाँ थ्रिल या रोमांच नहीं था बल्कि चुलबुलापन था, मौज-मस्ती थी। हम सभी बौराये से झील का अनुपम सौन्दर्य निहार रहे थे। नन्हा शौर्य अत्याधिक प्रसन्न रहा, उसे बहुत सारा मम (पानी) दिख रहा था। दादी की गोदी में किनारे बैठा वह, छप-छप कर रहा था। झील में तैरती कुमुदनी पकड़-फ़ेंक रहा था।
डल झील में दो बातें बहुत अच्छी लगीं। एक- वहाँ तैरते आवास, हाउसबोट। श्रीनगर आयें और वहाँ के हाउसबोट में रात्रि-विश्राम न किया, तो क्या किया? हाउसबोट युवा जोड़ों की पहली पसंद होती है, या यूँ कहें-ज्यादातर हनीमून-पैकेज  में हाउसबोट नाइट-स्टे पहले से जुड़ा होता है। यहाँ के हाउसबोट, केरल की तुलना में स्टेशनरी हैं, स्थिर हैं। किनारे से मेहमान की फेरी के लिये इनके अपने शिकारे होते हैं-निःशुल्क।
हमारे नाविक ने बताया कि डल झील में हाउसबोट का चलन डोंगरा राजाओं और अंग्रेजों के मध्य विवाद से हुआ। डोंगरा राजाओं द्वारा कश्मीर में स्थायी सम्पत्ति खरीदने और घर बनाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुये अँग्रेजों ने झील में बड़ी नाव पर लक्जरी केबिन बनाकर रहना आरम्भ कर दिया।
1962 की चर्चित फिल्म 'कश्मीर की कली' में सर्वप्रथम डल झील, हॉउसबोट और शिकारा-राइड को भारतीय दर्शकों ने पसन्द किया। यही कारण रहा कि बाद के फिल्म-निर्माताओं ने इनकी पॉपुलरिटी को जमकर भुनाया। जंगली, जानवर, कभी-कभी, जब-जब फूल खिले, रॉकस्टार, मिशन-ए-कश्मीर, लम्हा, दिल से, ये जवानी है दीवानी, जैसी सुपरहिट फिल्मों के कई रोमांटिक दृश्य और गीत डल झील के हाउसबोटों में फिल्माये गये हैं। हाउसबोट कीपर बड़ी शान से प्रचार-प्रसार करते हैं कि फलाँ-फलाँ फिल्म की शूटिंग इस हौजरे में हुई। 'मिशन-ए-कश्मीर' तथा 'गुल-गुलशन-गुलफाम' (टी व्ही सीरियल) नामक दो हाउसबोट हमने भी देखे।
डल झील का दूसरा मुख्य आकर्षण-वहाँ के तैरते बाजार थे। दुकानें भी शिकारे पर लगी थी और शिकारे पर सवार होकर विभिन्न वस्तुएँ खरीदीं जा रहीं थीं। शिकारे बार-बार हमारे नजदीक आ रहे अपने प्रोडक्टों का प्रदर्शन कर रहे थे, हमें ललचा रहे थे, हम मोल-भाव करें, कुछ खरीदें। चाय-चटपटे से लेकर कीमती केशर और जवहराती-जेवर तक सभी विक्रय हेतु उपलब्ध थे। 'या-हू' की मुद्रा में युवा एवं कश्मीरी वेशभूषा में छुई-मुई सी युवतियां झील में, शिकारे पर बिताये उन अविस्मरणीय पलों को कैमरों में कैद करा रहे थे। शिकारे पर झील में अतराता पोस्ट-ऑफिस भी हमारे आकर्षण का केन्द्र रहा। काश्मीर के कारीगरों, दस्तकारों, लघु व कुटीर उद्योग संचालकों, कृषकों को उनके उत्पादों का घर-बैठे उचित मूल्य मिले, बिना बिचौलियों की मदद के, यह सोचकर डल झील में तैरते बाजार की कल्पना की गई। यहाँ सैलानी/शौकिया लोग झील में घूमने का आनन्द लेते हुये रोजमर्रा की खरीददारी करते हैं, यानि आम के आम, गुठलियों के दाम। सोना झील से नागिन झील तक घूमने में अँधेरा गहराने लगा। हाउसबोटों पर जगमगाती रंग-बिरंगी विद्युत लड़ियों के प्रतिबिम्ब से झील का सौन्दर्य दुगुना हो गया था।
हम घाट की ओऱ आ रहे थे। हमारा नाव-चालक हमें बता रहा था कि ठण्ड में झील जम जाती है, एक सपाट मैदान, एक स्टेडियम की तरह। और, तब यहाँ के जुझारू लोग और उनके परिजन देवदार की लकड़ियों पर नक्काशी कर सुन्दर कलाकृतियाँ बनाते हैं। रेशमी कपड़ों पर बेलबूटे काढते हैं, एक अंगूठी से पार हो सकने वाला पश्मीना शॉल बुनते हैं। भारत-पाक सीमा पर आये दिन होती गोलाबारी और आतंक के साये में जीवन यापन करते लोगों की सर्जनात्मक-सामर्थ्य को  साधुवाद!

शिकारे से उतरते ही ख्याल आया कि यदि जम्मू के ट्रैवल-एजेंट की सलाह मान हम वहीं से वापिस लौट गये होते तो.......तो, ऐसी परानुभूतियाँ कैसे होतीं? तो, खुली ऑखों में स्वर्ग का अनावृत सौन्दर्य कैसे बसता? लेकिन, अभी दिल भरा नहीं। घूमने को बहुत बाकी रहा। मन ही मन संकल्प लिया कि बाबा अमरनाथ के दर्शनों को यहीं से जाना पड़ता है। यदि, उनकी कृपा रही, बुलाबा आया तो एक बार फिर इस शहर की श्री-सम्पदा देखने की चाह रहेगी, विशेषकर सोनमर्ग और पहलगांव।
हम कल जबलपुर लौटेगें, कुछ दिन यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभव शेयर करेंगे, फिर अपने राग में लग जायेंगे, लेकिन इन वादियों में गूंजतीं सूफी-सदाये बहुत देर तक और दूर तक, हमें सुनाई देंगी-
                                                     गर फ़िरदौस, रहें जमीं अस्तो 
                            हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो। 

मंगलवार, 17 जून 2014

गुलमर्ग

22 अप्रेल, 2014 -अल्ल्सुबह, हमारा परिवार श्रीनगर से गुलमर्ग के लिये निकला। टेंगमार्ग, जहाँ से गुलमर्ग के लिये 11.00 किलोमीटर पहाड़ पर चढ़ाई आरम्भ होती है। रुककर हल्का नाश्ता और चाय ली। बर्फीली-शीत से बचने के लिये फर-कोट, केप और गमबूट लिये। रंग-बिरंगे परिधानों में सब एक से बढ़कर एक दिख रहे थे, विशेषकर, पिंक-ड्रेस में पौत्र शौर्य एकदम एस्किमो दिख रहा था।
बर्फ पर चलने-घूमने का रोमांच हमारी हृदयगति बढ़ा रहा था, साथ ही एक सुनिश्चित उंचाई पर जाने का भय और, तापमान लगभग 6 डिग्री सेन्टीग्रेड। खैर, हिम्मत जुटाकर हम आगे बढे। बर्फ से ढके पहाड़ और उनपर झाँकते शंकुनुमा-विशाल देवदार के पेड़! मानो, मेहमानों की अगवानी में सुन्दर फूलों के गुलदस्ते लिये कतारबध्द खड़े हों। लगा, हम किसी काल्पनिक दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं।
हिमालयीन पर्वत-श्रृंखलाओं में से एक पीर-पंजाल पर 2653 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व का सबसे ऊँचा गोल्फ-कोर्स, गुलमर्ग-गोंडोला और एक सुन्दर स्कीइंग स्पॉट। चारों तरफ, जहाँ भी नज़र जाती, बर्फ ही बर्फ दिखाई देती। जहाँ हमारी टेक्सी रुकी, वहाँ 6 फुट बर्फ, कुल मिलाकर एक कटोरे की शक्ल में गुलमर्ग। सी.एन.एन. की एक रिपोर्ट में इस जगह को भारत में शीतकालीन खेलों की हृदय-स्थली कहा है। उस दिन गुलमर्ग पहुँचने वाली हमारी पहली टेक्सी थी, जिसमें सात देशी सैलानियों को देखकर वहाँ के जन-जीवन में यंत्रवत गति आ गई।
जैसे ही हमने बर्फ पर पैर रखा, हमें लगा मानो हमने चाँद पर पहला कदम रखा है। नील आर्म स्ट्राँग की भाँति हमें भ्रम हुआ कि कहीं हमारा पैर नीचे तो नहीं धँस जायेगा। यह भी कल्पना हुई कि नीचे बर्फ पिघलकर पानी
हो गया और ऊपर जहाँ, जिस जमीन पर खड़े हैं वह खिसक तो नहीं जावेगी। परन्तु, ऐसा नहीं हुआ। स्वच्छ, श्वेत, शॉफ्ट और स्पंजी बर्फीले धरातल को छूते ही परिजन ख़ुशी से नाचने लगे। हमारे मुँह से भी निकला "वाह"! मीना (पत्नी) और बच्चों के चेहरों पर आयी बड़ी सी मुस्कान ने हमारी ख़ुशी को दुगना कर दिया। निःसंदेह, यह भारत में अब तक देखे खूबसूरत स्थानों में सर्वश्रेष्ठ है।
सामान्यतः मई के प्रथम सप्ताह से गुलमर्ग में बहार आती है। हम कुछ पहिले आ गये। गुलमर्ग का मुख्य आकर्षण गोंडोला में सुधार/रखरखाव चल रहा था अतः हमलोग रोपवे से ऊँचाई पर जाकर और नयी ऊंचाइयों को नापने से वंचित रह गये। परन्तु हमारी कल्पनाओं के घोड़े थामने से भी न रुके। एक ऊँचाई पर जाकर नागा पर्वत (7000 मीटर) गिलगिट की चोटियों को निहारने का काल्पनिक सुख लिया। मन- रूपी गरुण तो अपने पंख पसारकर और ऊँची उड़ान भर आया एवं वहाँ खड़े-खड़े माउॅट- एवरेस्ट की परिकल्पना कर डाली। ऐसा लगा कि हम गोंडोला की अधिकतम ऊँचाई से कुशल प्रशिक्षक के साथ स्कीईंग करते तेजी से नीचे उतर रहे हैं- जोर-जोर से चीखते हुये, अपने डर को दूर भगाते हुए, मार्ग की सभी भव-बाधाओं को पार करते हुए।
"गोल्फ मैदान की बर्फ पर पैदल न चलकर स्लेज से दौड़ा जावे "-यह तय होने पर सात स्लेजों पर सवार हमारा परिवार-दल आगे बढ़ा। शौर्य अभी तक अपनी माँ से चिपका था, परन्तु बाद में बर्फ पर अठखेलियों का सही आनंद इस जूनियर सदस्य ही ने लिया। ऋषि और वर्षा ने अपने स्लेज आपस में जोड़ रखे थे, एक स्लेज वाहक उन दोनों को एक साथ खींच रहा था। हम सबसे पीछे थे। एक तरह से अपने दल को हंकारते हुए, उनका उत्साह-वर्धन करते हुए। हँसी,ठिलठिलाहट , चीख, सीटियों की आवाज, कभी गिरना, ऊपर से नीचे जाना, अपने स्लेज-वाहक को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना-यही आनन्द था बिना पहियों की, बिना ब्रेक की गाड़ी पर चलने का! दौड़ने का !!
स्लेज खींचने वाले बड़े मेहनती और बाक्पटु थे। उस विस्तारित मैदान में कुछ प्राकृतिक, कुछ काल्पनिक वियु-पॉइन्ट बता रहे थे। बीच-बीच में वे फिल्मों, फ़िल्मी नायक-नायिकाओं और उन पर फिल्माये दृश्यों/गीतों की बातें कर हमारा कौतुहल बढ़ा रहे थे। उनकी जानकारी में अभी तक वहां 22 फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है, जिनमें हाइवे, ये जवानी है दीवानी, जब तक है जान, स्टूडेंट ऑफ़ द इयर, सात खून माफ, रॉक स्टार, मिशन-कश्मीर और लम्हा प्रसिध्द हैं। एक वरिष्ठ वाहक बता रहा कि
वह यहाँ तीन पीढ़ियों की शूटिंग देख चुका है। 1962 में शम्मीकपूर आये थे, कश्मीर की कली की शूटिंग के लिए, 1974 में ऋषिकपूर और डिम्पल बॉबी के लिए आये और अभी 25 जनवरी को रणवीर कपूर, दीपिका पदुकोण अपनी फिल्म यूनिट  के साथ आये थे (-) 10 डिग्री तापमान में उन्होंने यहाँ शूटिंग की।
मौसम आज भी बेहद ठण्डा रहा, तब भी स्लेजवाहक पसीने से लथ-पथ हो रहे थे। बर्फ पर नंगे पैर दौड़ना और सवारी खींचना दोनों मेहनत के काम हैं। बॉबी हट (कहते हैं यहाँ बॉबी फिल्म की शूटिंग हुई थी) पर आकर हमारी आगे-पीछे दौड़तीं स्लेज एक लाइन में रुक गयीं। स्लेज खींचने वाले भी ओत लेने (सुस्ताने) लगे। हम सभी ने भी अपने हाथ-पैर सीधे किये और बर्फ से खेलने लगे। शुरुआत में लगा बर्फ ठण्डी होगी,सख्त होगी। परन्तु हाथ में लेते ही एक विशेष गर्माहट महसूस की। वह रुई जैसी मुलायम थी, उसे उठाकर एक दूसरे को मारना ऐसा लगता था जैसे बृज में फूलों की होली खेल रहें हों।
स्लेज दल नायक बार-बार आग्रह कर रहा था -"अपने-अपने पर्स, मोबाईल और अन्य कीमती चीजें सम्भाल कर रखें। यहाँ के लोग चोर या पॉकेटमार नहीं हैं, बर्फ चोर है।" लगा एक सच्चाई और ईमानदारी है, उसके कथन में। बर्फ में एक बार कोई वस्तु गुम जावे, फिर उसे ढूँढना नहीं होता।
सूर्य सिर पर आ गया था। गुनगुनी धूप रही इसलिए ठण्ड से थोड़ी राहत रही। टूरिस्टों की हलचल बढ़ गयी थी। हमारी स्लेज गाड़ियाँ फिर दौड़ने लगीं। साथ-साथ चलते-दौड़ते स्कीईंग के यंत्र/उपकरण लिए, बार-बार अनुरोध करते, ट्रेन्ड प्रशिक्षक का प्रमाण-पत्र दिखलाते, कुछ ही देर में बर्फ पर स्कीईंग से दौड़ाने का वायदा करते। बीच मे एक नाला आ गया, जिसमें लबालब पानी बह रहा था। वह वहाँ की बर्फ का द्रव में अवस्था-परिवर्तन था। नाले पर बने अस्थायी पुल को पारकर हम खुले मैदान में आ गए।
यहाँ एक चौपाटी जैसा माहौल था। मेगी ,चिप्स, बिस्किट,चाय आदि की दुकानें सजीं थीं। स्कीइंग वाले तो वाकायदा स्टॉल लगाये हुए थे। हमने वहाँ चाय पी। बच्चों ने गर्मा -गर्म मेगी खाई। स्लेजवाहकों के साथ उनके कुछ लोग जुट गए। उनमें से एक ढपली बजाने लगा। जब तक है जान फिल्म का गीत 'जिया रे' की स्वर-लहरियाँ वहाँ गूंजने लगी। एक स्लेज-मैन नाच रहा था। हमने शौर्य को छोडा, तो वह उस गीत-संगीत पर अपनी कमर मटकाने लगा। अच्छा खासा मनोरंजन, बिल्कुल शूटिंग का सा माहौल बन गया।
हम सभी ने मुलायम बर्फ समेट कर एक बन्दर (मंकी) की आकृति बनाई, उसे सजाया, सँवारा और नाम दिया मन्ना (पौत्र शौर्य मंकी को मन्ना कहता है) उसके साथ फोटो खिंचवाए। बर्फ पर अपने नाम लिखे-सन्देश छोड़े यह जानते हुए कि बर्फ एक मायाबी स्वरुप है, छलावा है। कुछ देर बाद अपनी अवस्था परिवर्तन कर लेगा।अबीर (सबसे छोटा बेटा) बर्फ पर लेट-लेट कर पीठ से मार्डन-आर्ट बना रहा था, लगा उसने इस कला का पूर्वाभ्यास किया है।
स्कीईंग किसी को नहीं आती रही। हाँ! थोड़ी बहुत स्केटिंग सभी को आती थी। प्रशिक्षण लेकर या प्रशिक्षक के साथ स्कीईंग कठिन भी नहीं थी। हम लोगों ने उपकरण लिए, हल्के-फुल्के टिप्स लिए और दो-दो हाथ अजमाने लगे। चले, दौड़े, गिरे, चोट खाई, सहलाया और फिर उठकर चल दिए। यही तो जीवन का क्रम है। स्कीईंग न सही, परन्तु उसके लिए किया गया ईमानदार प्रयास ही हमारे लिए पर्याप्त था। ठीक वैसे, जैसे तैरने के लिए पानी में उतारना।
गुलमर्ग की गुलबादियों को चंद घण्टों में घूमना सम्भव नहीं, परन्तु हम अपने  हिसाब से चल रहे थे। स्लेज वाहक भी जल्दी में दिखे। सैलानियों की क्रमशः बढ़ती संख्या पर उनकी आँखें जमी हुईं थी। वे इस जुगत में रहे कि जल्दी से जल्दी हमसे फारिग हों। लौटते समय हमारा सलेजमेन बता रहा था
मई-जून में यहाँ मैदान में  सुन्दर हरियाली होती है। ऊपर के हिस्से में गुलमर्ग-गोंडोला के बगल में लीची के बगीचे होते हैं। सामने मैदान में पोनी-राइडिंग होती है। हाँ! ऊपर पहाड़ पर बर्फ होती है, जहाँ एडवेंचरस-स्पोर्ट्स होते हैं। विषयांतर होने पर वह बोला फिल्म वाले बड़ा धोका देते हैं। अभी-अभी आई फिल्म 'ये जवानी है दीवानी' के ट्रेकिंग-ट्रिप्स यहाँ गुलमर्ग में फिल्माए गए, जिन्हें मनाली का बताया जा रहा है। ऐसा और फिल्मों में भी होता है। हम लोग तो उनके स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाते हैं और वे हमारे साथ चिटिंग करते हैं।
स्लेज-वाहक ने यह भी बताया गुलमर्ग में कोई घर नहीं बनाता। पाकिस्तानी नियंत्रण रेखा (एल ओ सी) यहाँ प्रभाव डालती है। यहाँ की आबादी 500-600 ही है। होटल में रुकने वाले और होटल में काम करने वाले, बस! उसने यह भी बतलाया कि यह वास्तव में 'गौरी -मार्ग' है, माता गौरी (पार्वती) अपने पति भगवान शिव से मिलने इसी रास्ते से आती-जाती थीं। यूसुफ शाह चक ने इसका नाम बदलकर गुलमर्ग यानि फूलों का मैदान रख दिया।
वापिस आने पर स्लेज-वाहक ने हमसे पूछा -'गुलमर्ग कैसा लगा?' हमने कहा -'वाह! स्वर्णिम!! अलौकिक!!!' उसने अत्यन्त भावुक लहजे में कहा -'आप सैलानी हमारे लिये भगवान का प्रतिरूप हैं। आप आते हैं तो हमें और हमारे बच्चों को खाना मिलता है। आप प्रसन्न होंगे तो वापिस जाकर अपने चार दोस्तों को कहेंगे कि गुलमर्ग सुरक्षित है, तो चार लोग और आयेंगे। बीच में जब आतंकबादियों के कारण टूरिस्टों ने यहाँ आना बंद कर दिया था, तब कई दिनों हमारे घर में चूल्हा नहीं जला।' हमने उसे आश्वत किया कि हम वापिस लौट कर अपने मित्रों/परिचितों को अवश्य बतलायेंगे, ब्लॉग लिखेंगे। भारत का स्वर्ग ,कश्मीर ,पर्यटन के लिये पूर्णरूपेण सुरक्षित है।
एक छोटी सी जगह में लगभग 40 छोटे-बड़े होटल, तीन से पाँच सितारा तक। टेक्सी-ड्राइवर ने होटल हाईलैंड भी दिखाया, जहाँ फिल्म बॉबी की कुल शूटिंग हुई, विशेषकर वह गाना 'अंदर से कोई बाहर न जा सके'। लगभग 4.0 बजे हम टेंग मार्ग पहुंचे, किराये के फर-कोट और जूते वापिस किये। सभी को जोरों की भूख लगी थी। वहाँ के एक रेस्टॉरेन्ट में गर्म-गर्म आलू पराठे खाये। जो गुलमर्ग के गुमनाम उपन्यास में कृष्ण चन्दर द्वारा वर्णित पराठों जैसे स्वादिष्ट थे, वैसे ही चटखारे वाले, अंगुलियाँ चाटने वाले। एक-एक कप कहवा पिया और रास्ते में सेव के बाग देखते हुये हमने कश्मीर के बॉलीवुड को अलविदा कहा।

रविवार, 1 जून 2014

ऑन दा वे टू श्रीनगर

वैसा ही हुआ, जैसा हम पिछली रात सोच कर सोये थे। सभी देर से उठे। अगली यात्रा के लिए टेक्सी पड़ताल की, तो कोई भी ट्रेवल एजेंसी हमारे सीमित समय में श्रीनगर घुमाने को राजी नहीं हो रही थी। उनका कहना था -"श्रीनगर जाना है तो छह दिन चाहिये, तीन दिनों में पटनीटॉप, शिवखोड़ी होकर जम्मू के साइट सीन्स देख लीजिये। क्यों व्यर्थ पैसा बर्बाद करते हैं?" उनकी बात में दम था। परन्तु, हमारी अपनी मज़बूरी रही। समय वास्तव में कम था। हाँ! हमने जब अपना पक्ष रखा कि किसी एक शहर को सलीखे से घूमने के लिए दस दिन भी कम हैं, उसे एक दिन में भी देखा जा सकता है; तो वे हमसे सहमत हो गए। और एक नई इनोवा गाड़ी शुभम-ट्रेवल्स के माध्यम से प्राप्त हुई। हमारा टेक्सी-ड्राइवर राजू बहुत मिलनसार था। रास्ते में वह एक प्रशिक्षित गाइड की भाँति जम्मू-कश्मीर का इतिहास, भूगोल, संस्कार-संस्कृति, राजनैतिक एवं सामाजिक स्थिति अपने अंदाज में बयां करता रहा। बीच-बीच में जब हम चुप हो जाते या हल्के-हल्के झोंके लेने लगते तो वह 'भगत के वश में हैं भगवान' सी.डी.चालू कर देता। वह धाराप्रवाह हिंदी बोलता था, मोबाईल पर डोंगरी में बात करता था, बाद में पता चला कि वह मुसलमान था।
घुमावदार रास्ता बर्फ, वहाँ का कस्बाई जन-जीवन, दूर पहाड़ पर चांदी सी चमकती बर्फ हमें आकर्षित कर रही थी। मौसम सुहाना था। हम दा एक कल्पनालोक में प्रवेश कर रहे थे। महाभारत के मिथ से जुड़ते हुए सौरभ ने कहा -पाण्डवों ने वानप्रस्थ में इसी मार्ग से स्वर्गारोहण किया होगा? सच में, यदि स्वर्ग की कल्पना निराधार नहीं है, तो स्वर्ग का रास्ता इन्हीं नैसर्गिक वादियों से गुजरता होगा।
रास्ते में पटनीटॉप रुके। वैष्णव देवी से 40 किलोमीटर की दूरी पर, ऊधमपुरजिले में एक पिकनिक स्पॉट। निचली हिमालयन पर्वत मालाओं में समुद्र सतह से 2014 मीटर ऊपर। चिनाब नदी के किनारे-किनारे, वादियों का सौन्दर्य, माउंट-स्केप,पाइन-फारेस्ट, हरियाली, सुखद वातावरण। 20 अप्रैल की दोपहर, परंतु तापमान 15-16 डिग्री। हमारे टेक्सी-ड्राईवर ने बताया कि हम कभी भी आयें, इससे ज्यादा टेम्परेचर यहाँ नहीं रहता।
पटनीटॉप का वास्तविक नाम 'पाटन दा तालाब' था,जिसका अर्थ 'राजकुमारी का तालाब' रहा। ब्रिटिश राजस्व-दस्तावेजों में अपभ्रंशित होकर पटनीटॉप हो गया। एक जगह पतनितोप भी लिखा देखा। सैलानियों के लिये स्वर्ग इस स्थल को 'मिनी-कश्मीर' भी कहा जाता है। छोटी सी जगह में बहुत सारे टूरिस्ट हॉटल, सभी लबा लब। अभी ज्यादातर बंगाली परिवार, कुछ हनीमून कपल्स भी। नाथा टॉप में अच्छी खासी भीड़ रही। वहाँ के हरे-भरे खुले वातावरण में शौर्य (पौत्र) को तो मानो पर लग गए, उसने लॉन में खूब लोट लगाई, बहुत देर दौड़ा। हमने वहाँ पानीपुरी खाई, फोटो खिचवाई और सुकून के कुछ पल बिताये। यह स्थान मिलिटरी नियंत्रण से मुक्त है, अतः लगता है, यहाँ प्रकृति एवं प्रकृति-प्रेमी खुलकर साँस लेते है।
पटनीटॉप को पांव-पांव घूमते हुये हमने 600 वर्ष पूर्व निर्मित लकड़ी का बना नाग मंदिर (कोबरा मंदिर) देखा। वहाँ आयीं प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी यथावत। इस मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। यहाँ स्थानीय दस्तकारी और कशीदाकारी बेजोड़ है। कई विक्रय केन्द्र रहे जो पर्यटकों को ललचा रहे थे। एक कम उम्र का बाक-पटु बालक हमें 'बुलबुल का बच्चा' दिखाने के बहाने ले गया, परन्तु वहाँ कश्मीरी कम्बल बिक रहे थे। पूत के गुण पालने में देखकर हम हतप्रभ रह गए। वैसे यदि हमें मोल-भाव करना आता तो शाल और सलवार-शूट्स अच्छे और खरीदने योग्य रहे।
लौटते में, ड्राईवर ने बताया कि नवम्बर-दिसम्बर में यहाँ बर्फ पड़ती है। तब, स्थानीय आवागमन हेतु चैन टायर की गाड़ियाँ चलती हैं। वैसे शीघ्र ही राज्य-सरकार यहां रोपवे लगाने जा रही है, ट्रैकिंग, पैराग्लाइडिंग तथा मौंटेअरिंग के लिए आने वाले सैलानियों के लिए यह एक अच्छी ख़बर है।
पटनीटॉप छोड़ते ही वातावरण ठण्डा होने लगा। शीत लहर चलने लगी, लगा बर्फ गिरेगी। सभी खुश; बच्चों के मन-मयूर नाचने लगे। कुहासे के माहौल में लरजते पहाड़ी झरने कुछ अधिक शीतलता दे रहे थे। परन्तु दूसरी तरफ खाई से लहराते देवदार के वृक्ष गलबहियाँ डालने के लिए आतुर दिख रहे थे।
मानो, हमसे कुछ कहना चाहते हों-आपबीती भी, जगबीती भी। सच है, उनके पास बहुत है कहने-सुनाने के लिए। उन्होंने ही देखा है कल्हण की राजतरंगिणी का प्रवाह, उन्होंने ही तो सुनी है कवि कालिदास के मेघदूत की अनुगूँज। अशोक मौर्य से लेकर उमर अब्दुल्ला तक की सियासी गतिविधियों के समय साक्षी हैं ये देवदारु (देवताओं के लिए पेड़) वन। शिव-पुराण के आधार पर कहें तो, ये देवदार वन-भगवान शिव की बाट जोहते सिद्ध-साधु है, न जाने किस वेश या स्वरूप में प्रभु निकल जावें इसलिए हर आने-जाने वाले को वे नतमस्तक होते है। वैसे यदि देवदार के दो सीधे तने खड़े पेड़ों के मध्य अपलक दृष्टि जमायी जावें, तो वहां एक नई सृष्ट्रि जन्म लेती दिखाई देती है। चिंतन के नये आयाम खोलती हुई, हर बार नयी रोशन, हर बार नयी सोच, हर बार नया बिचार; लगता, देवदार के दो पेड़ नर और नारायण के अवतार हैं। उनके बीच एकाकार होती दुनियाँ, प्रकृति का पुरुष से मिलाप, जीवात्मा का परमात्मा में प्रवेश, जीवन का क्रम यूँ ही चलता है।
हमने अपने सिर को हौले से झटका, और बाहर के नज़ारे देखने लगा। पहाड़ की ढलान पर बने इक्के-दुक्के घर सुन्दर लग रहे थे। उनकी बाह्य दीवारें चटक रंगों से पुती थीं, जोउन में रह रहे लोगों की जीवट-वृत्ति की परिचायक थी। बर्फवारी -आक्रान्त क्षेत्र में घरों पर टीन की चादरें स्लोप में बिछी दिखीं, गिरी हुई बर्फ जल्दी से जल्दी बह जावे या नीचे खींची जा सके, यही सुविधा सोचकर यहाँ पक्की फ्लैट स्लेब नहीं ढालते। पटनीटॉप से
लगभग 50 किलोमीटर दूर रामबन आया, वहाँ के प्रसिध्द राजमा-चाँवल अनार की चटनी के साथ खाए। खाना खाते समय यहाँ से बगलिहार बांध का 370 मीटर का स्पिलवे स्पष्ट दिखाई दे रहा था। एन.एच.पी.सी. व्दारा निर्मित इस रन ऑफ़ द रिवर प्रोजेक्ट में 900 मेगावॉट विद्युत उत्पादन हो रहा है।
चिनाब नदी पर बना यह प्रोजेक्ट अंतर्राष्ट्रीय विवादों के कारण खूब चर्चित रहा। वैसे, इस राज्य में ऊर्जा-उत्पादन की असीम संभावनाएं हैं बशर्ते पाकिस्तानी पंचाट आड़े न आये।
टेक्सी ड्राईवर ने बातों-बातों में यह भी बतलाया कि एन.एच.ए.आई. चिनानी-नाजश्री टनल (लगभग 9.1 किलोमीटर) बनाकर जम्मू से श्रीनगर की दूरी 50 किलोमीटर कम कर रही है। इससे दो फायदे होंगे: एक, एलिवेशन में करीब 1.2 किलोमीटर कम होगा। दूसरा श्रीनगर की दूरी 5 घण्टों में तय हो सकेगी।
रास्ते में मीना (पत्नी) ने कान में दर्द की शिकायत की। पुत्रवधु (डॉ.) वर्षा ने बताया कि यह हाइट-फोबिया है। एक ऊचांई पर आकर ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, जिससे कान में झनझनाहट, कान सुन्न पड़ना या कान तड़कने लगते हैं। हवाई यात्रा के समय भी ऐसा अनुभव होता है।

हमने टेक्सी रुकवाई। हम अपनी सड़क यात्रा की अधिकतम ऊँचाई पर थे। रोड किनारे एक टपरा था, जहाँ करीम मियां की भट्टी धूं-धूं कर जल रही थी और बाजु में कुछ कदम दूर एक खूबसूरत पहाड़ी झरना था। उसके ठंडे पानी के छींटे मारते ही नींद, सुस्ती, थकान सभी गायब, परन्तु ठण्ड से झुरझुरी दौड़ने लगी। सभी ने गर्म कपडे पहिने, गर्म चाय पी, और करीम मियाँ के बनाये पुए भट्टी में सेंक-सेंक कर खाए। सहज बातचीत ने कब आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर डाले? पता ही नहीं चला। 'चाय की दुकान' और 'एक प्याली चाय' की दुनिया ऐसी ही होती है। भट्टी की आंच ने ठुठरती हड्डियों को राहत दी। करीम मियाँ ने बताया कि ठण्ड में बर्फ सड़क पर उतर आती है, तब कई-कई दोनों तक आवागमन अवरुध्द रहता है। जम्मू-श्रीनगर मार्ग पर यातायात टप्प होना यानि कश्मीर की लय बिगड़ना है। अभी कल ही लैंड-स्लाइड के कारण घंटों ट्रैफिक जाम रहा। वास्तव में, बार्डर रोड के इंजीनियर बधाई के पात्र हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी प्रकृति के विरुद्ध निर्माण करते हैं जन-जीवन की गति बनाये रखते हैं। करीम मियाँ ने बताया कि सामने ढलान पर उसका छोटा सा घर है। मौसम कैसा भी रहे, चाय की दुकान रोज खुलती है। चलते-चलते उन्होंने एक सलाह दी: आगे चाँवल नहीं खाना, मोटा चाँवल मिलता है, सभी को सूट नहीं करता, ब्रेड फुल्के चलेंगे। एक बड़े-बुजर्ग की बिना मांगे मिली सीख हमने गाँठ बांध ली।
राजू से बतियाते हुए हम ऐतिहासिक जवाहर सुरंग तक आ पहुंचे। 3 किलोमीटर लम्बी, जम्मू और कश्मीर के मध्य राष्ट्रीय राजमार्ग 1-ए पर यह इकलौती यात्रा-विकल्प है। प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू व्दारा लोकार्पित यह सुरंग मार्ग सुबह 5.00 बजे से रात्रि के 11.00 बजे तक खुला रहता है। इस पर बार्डर सिक्युरिटी फोर्स की सतत निगरानी रहती है। देश की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा में सीमा सुरक्षा बलों के साथ तैनात शक्तिमान ट्रकों को देखकर मन प्रसन्न हो गया। एक निजता, या यूँ कहें निजी संतुष्टि का अनुभव किया, क्योंकि ये ट्रक हमारे जबलपुर स्थित व्हीकल फैक्ट्री में बनते हैं।
रात्रि के 11.00 बजे हम होटल अलसमद पहुचें। मुस्लिम कल्चर और इंटीरियर से सुसज्जित, इसके कमरे आरामदायक तथा हवादार थे। श्रीनगर कभी आतंकवादियों और घुसपैठियों के कारण देशी-विदेशी सैलानियों के लिए असुरक्षित तथा बंद रहा, अब स्थिति सामान्य है। फिर भी, रात का समय, नया स्थान, नया वातावरण, हम कुछ तनावग्रस्त रहे। परन्तु होटल के रूम अटेण्डेंट अनवर का तकियाकलाम -'टेन्शन नहीं लेने का' हमें तनावमुक्त कर गया। रात में बहुत सुकून से नींद आई।

मंगलवार, 27 मई 2014

माँ वैष्णव देवी (अर्धकुंवारी से आगे का सफ़र)

अर्धकुंवारी से भवन तक पहुँचने के लिए हम लोगों ने नया वैकल्पिक रास्ता चुना। यह पुराने रास्ते की अपेक्षा आसान एवं आधा किलोमीटर कम था। यहाँ से निशक्त जनों, विकलांगों एवं सीनियर सिटीजन्स के लिए ऑटो रिक्शा चलते हैं। काउंटर से तीन सौ रुपये में आने-जाने का पास मिलता है, बीमारी का सर्टिफिकेट या षष्ठि-पूर्ति का प्रमाण पत्र दिखाने पर। इस रास्ते पर पहाड़ी से लुढ़कते पत्थरों का डर रहा। अस्थायी सुरक्षा बतौर चिन्हित स्थलों पर टीन के शेड्स लगाये गए हैं, परन्तु देर सबेर पहाड़ी तरफ कंक्रीट की दीवार बना स्थायी समाधान आवश्यक होगा।


रास्ते में दिल्ली के रघुनन्दन शर्मा (रिटायर्ड सेल्स टैक्स ऑफिसर) मिले, उम्र ७३ वर्ष, लेकिन कमर झुकी नहीं थी। लकड़ी तो सहारे के लिए ले रखी थी, परन्तु तनकर चलते थे। वे यात्रियों को बाहिरी रैलिंग के पास बैठने एवं उसे पकड़कर चलने के लिए मना कर रहे थे। आज की ही ताजा घटना उन्होंने सुनाई- दो-तीन लोग बच्चों सहित रैलिंग के पास बैठे थे, अचानक बंदरों ने उनपर धावा बोल दिया। वह तो शर्मा जी और अन्य लोगों ने अपनी लाठी से बंदरों को धमकाया-डराया, तब उनकी जान बची। शर्मा जी का एक तर्क और रहा- पहाड़ी से लुढ़कते पत्थर रैलिंग तरफ़ ही सीधी मार करते हैं। चर्चा में शर्मा जी ने यह भी बतलाया कि अर्धकुंवारी में उन्हें जलगांव की दो महिलाएं मिली थी, जिनका पर्स और पैसा गुम गया। शर्मा जी ने उन्हें एक सौ रुपया दिया और कुछ लोगों से पैसा दिलवाया; कम से कम वे अपने घर तो पहुँच सकेंगी। शर्मा जी से क्षमा मांग कर हम अपने परिजनों के साथ हो लिए।


भवन की स्वच्छ, निर्मल सौंदर्यमयी प्रथम छवि दिखते ही हम सभी का जी बाग़ बाग़ हो गया। हम सभी मारे ख़ुशी के नाचने लगे। बस! कुछ दूर और, मील के कुछ पत्थर पार करते ही मंज़िल तय। घुमावदार रास्ते के प्रत्येक सौ मीटर पर लगे चैनेज स्टोन को देखकर लगता, मानो हमारा कोई हितैषी-रिश्तेदार वहाँ खड़ा मुस्करा रहा है। हमारे आने पर प्रोत्साहित करता हुआ, हमारे आगे बढ़ते ही हमें 'बैक-सपोर्ट' दे रहा है।
यात्रा के प्रारंभ में हम सशंकित रहे। मैहर में माँ शारदा मंदिर की सीढ़ियां और मंडला के काला पहाड़ की सीधी चढ़ाई में असफलता के पूर्व अनुभव हमारे साथ थे। सच! यह माँ वैष्णव देवी की कृपा थी, हमें शक्ति मिली, हमने एक कठिन यात्रा को पूरा किया और शाम होते-होते मंदिर परिसर में प्रवेश पाया। दर्शनों हेतु लाइन में लगकर ऐसा लगा, मानो एक स्वप्न देख रहे हों। कभी कल्पना की थी, माता रानी के दर्शनों की, कब? कैसे? यह नहीं सोचा था। आनन-फानन बनी योजना और तत्काल रिज़र्वेशन की सुविधाओं का लाभ उठाते हुए हम आखिर, दरबार तक पहुँच ही गए। सपना जो सच होने जा रहा था। यात्रा के सारे कष्ट, शरीर की सारी थकान कुछ देर के लिए भूल गए। मन ने बाह्य कष्टों पर विचार करना छोड़ दिया। अन्तर्मन में सिर्फ और सिर्फ माँ की वही छवि उभरने लगी जो सामने क्लोज सर्किट टी.व्ही. पर दिखाई दे रही थी। वातावरण कुछ ठंडा हो गया था। हम सभी जर्सी, स्वेटर इत्यादि पहिनकर लाइन में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
कतार में रहे सहयात्रियों से बतियाते, उनके दुःख-दर्द, उनकी सुखद अनुभूतियों को शेयर करते हुए हम आगे बढ़ते गए। हमारे साथ जो परिवार था, वह माता के दरबार में पहले भी आ चुका था। उन्होंने बताया कि मातारानी इस भवन में नीचे बनी गुफ़ा में है। हम सीढ़ी चढ़ते हुए ऊपर जाएंगे और फिर गुफ़ा के लिए नीचे उतरेंगे। माँ के दर्शन चौबीसों घंटे होते हैं, बस सुबह शाम आरती के समय विराम रहता है। मुख्य गुफ़ा में प्रवेश वर्जित है। वह रास्ता नवरात्रियों में खोला जाता है। नवरात्रियों की भीड़ और धक्का-मुक्की को याद कर, उन्होंने बतलाया कि वहाँ उपस्थित सुरक्षाकर्मी एवं व्यवस्था-प्रभारी मूर्ति के सामने रुकने नहीं देते। कई बार तो हम प्रकटित प्रतिरूपों के ठीक से दर्शन नहीं कर पाते और पीछे से धक्का या घुड़की आ जाती है और हम बाहर आ जाते हैं। इतना कष्ट सहकर हम जहाँ दर्शनों की लालसा लेकर आते हैं, वहां क्लोज सर्किट टी.व्ही. से ही संतुष्ट होना पड़ता है। हम लोग सोच रहे थे कि यदि आज भी ऐसा हुआ तो हमारा आगमन/प्रयास व्यर्थ होगा। खैर, मन ही मन जयकारा लगाते हुए जब हम गुफा द्वार पर आये तो एकल कतार बद्ध हो गए। गुफ़ा के अंदर के शांत, शीतल एवं सुगंधित वातावरण से मन में विश्वास जग रहा था कि माता रानी के ठीक-ठीक दर्शन हो जावेंगे।
और...वह स्वर्णिम क्षण आया जब हम प्रमुख प्रतिमाओं के सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी की दबंग आवाज़ सुनाई दी-"अपने बाएं तरफ दृष्टि डालें जो खड़ी मूर्तियों के दर्शन आप कर रहे हैं उनके ठीक नीचे माता की स्वयंभू झांकियाँ हैं"।



हम अवाक थे, हतप्रभ थे, चमत्कार सा देख रहे थे। ऐसा लगा- हमारे आगे-पीछे कोई नहीं है। माँ का दिव्य दरबार है, उनकी मनोरम झांकियाँ हैं और हम अपलक उन्हें निहार रहे हैं। न कोई भीड़-भाड़ न कोई धक्का-मुक्की, न कोई पुलिस या घुड़की। माता के दर्शन की लालसा पूर्ण होते ही नेत्र स्वयमेव बंद हो गए, मानो उन दृश्यावलियों को सदा-सदा के लिए कैद करना चाहते हों। वहां उपस्थित पंडितजी ने हमारी तन्द्रा भग्न की-"थोड़े आगे आइये जजमान। हम आपको तिलक लगा दें"। हमने उसी स्थिति में अपना मस्तक आगे झुका दिया। भाल पर सिन्दूरी तिलक अंकित कर पंडितजी ने हौले से आगे बढ़ने का संकेत किया। हम इसे अपना सौभाग्य माने या मातारानी की कृपा। सच है उनकी मर्ज़ी के बिना तो यह सब संभव नहीं था। अन्य परिजनों के साथ जब अलीशा और शौर्य का क्रम आया तो पंडितजी ने शौर्य को मातारानी के चरणों में लिटाने की अनुमति दे दी। वर्षा को मातारानी के आशीष के रूप में चुनरी प्राप्त हुई। हम सभी प्रसन्न एक-दूसरे को इस यात्रा का श्रेय देने लगे परन्तु हमारे हिसाब से इस यात्रा का पुण्य 'शौर्य' को मिला, क्योंकि उसके साथ हम सभी को यह दर्शन लाभ मिला। एक बार पुन: माँ के श्री चरणों में नमन किया और गुफ़ा से बाहर आये।


काउंटर से प्रसाद लिया। अमानती सामग्री (मोबाइल, कैमरा, पर्स, चमड़े की सामग्री जूते इत्यादि) मुक्त कराये।

शारीरिक थकान अब हावी होने लगी थी। हमलोग जहाँ बैठे थे लगा वहीं बैठे-बैठे नींद आ जाएगी। परन्तु वह स्थल मुख्य प्रवेश द्वार से लगा था, उसे तो अन्य दर्शनार्थियों के लिए खाली करना था। भूख भी लग रही थी। मंदिर परिसर के बाहर थोड़ा बहुत खाना खाया, बिना लहसुन प्याज़ का-प्रसाद था। आत्मा तृप्त हुई, मन संतुष्ट हुआ। परन्तु शरीर शिथिल हो गया। खाने के बाद तो अपनी काया खुद को भारी लगने लगी। वापिस भी उतारना रहा। सुनते आये थे कि चढ़ाई की अपेक्षा उतरने में कष्ट होता है, अधिक ऊर्जा लगती है। स्वाभाविक है हमें अपने गुरुत्व केंद्र के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है, कष्ट तो होगा ही। रात्रि के ग्यारह बज रहे थे। वहां का तापमान ठिठुरन भरा था। हमारे पास सीमित गरम कपडे रहे। यात्री निवास में जगह नहीं मिली। मंदिर से कम्बल लेकर रात काटी जा सकती थी, परन्तु फिर दूसरे दिन का कार्यक्रम बिगड़ जाता। सभी ने विचार कर वापिसी विकल्प घोड़े चुने। बाबा भैरवनाथ को प्रणाम कर मातारानी की निर्मल झाँकियाँ अपने अंतर्मन में सहेजे हम वापिस लौट पड़े।
घोड़े पर चढ़ने और चलने खासकर एक ऊंचाई से नीचे में डर लगा। एक दूसरे को ढाँढस बंधाते, प्रोत्साहित करते हम चल रहे थे। नेतृत्व सौरभ ने संभाला। अलीशा और शौर्य का साईस बहुत अच्छा था, वह बीच-बीच में शौर्य को अपनी गोद में ले लेता था। अबीर का घोड़ा और साईस अपेक्षाकृत सुस्त रहे, उसे बीच में लेकर चलना पड़ा। वर्षा का घोड़ा मालिक अक्सर घोडा छोड़कर मोबाइल पर बात करता रहता था और उसे लगातार वर्षा की डाँट खानी पड़ी। मीना का घोड़ा हमने लगभग साथ रखा था, क्योंकि हम जानते थे कि वह बहुत डरती है। हमारा घोड़ा मालिक बहुत अनुभवी रहा। लगातार हम लोगों से बात करता रहा और "टिकी-टिकी-टिकी" कर घोड़े को संकेत देता रहा। जहाँ सीधा उतार होता, वह आगे आ जाता और लगाम पकड़कर घोड़ा उतारता था। बाकी समय या तो हमारे साथ चलता या पीछे घोड़े की पूँछ पकड़कर। घोड़े पर बैठने और लम्बी यात्रा के प्रारंभिक सूत्र उसने हमे दिए-घोड़े पर बैठकर कमर सीधी रखना, लगाम पकड़ने के लिए उसने मना किया था।पकड़ने के लिए घोड़े पर कसी जीन से एक हत्था था। उसने यह भी हिदायत दी थी कि हम सीधे सामने या ऊपर का नज़ारा देखते चलें, नीचे न देखें। ऊंचाई  उतरने का यह फंडा हमें तो आता था, परन्तु दल के बाकी अश्वरोही इससे अनभिज्ञ थे। चौदह कि.मी. घोड़े की पीठ पर बैठकर यात्रा कल्पना से परे थी। ऊपर से रास्ते में घटती बढ़ती प्रकाश व्यवस्था। पैरों और जांघों में असहनीय पीड़ा हो रही थी परन्तु थकान और रात्रि के कारण पैदल मार्ग या सीढ़ियों से उतरने का रिस्क हमारा परिवार नहीं ले पाया। बड़े कष्ट की कल्पना ने छोटे कष्टों का डर समाप्त कर दिया।
साईस से हमने घोड़ों के इतने अभ्यस्त होने का राज़ पूछा तो उसने बतलाया कि यही उनकी आजीविका है। रोज़ वे और उनके घोड़े ऐसे ही यात्रियों को ऊपर नीचे ढ़ोते हैं। लगभग दो चक्कर प्रतिदिन हो जाते हैं। "कभी घोड़े फिसलते नहीं"? प्रश्न के उत्तर में उसने कहा-"कभी नहीं हुआ"।
और हम मातारानी से दुआ माँग रहे थे कि आज भी ऐसा न हो। क्योंकि हमने आज ही अपनी इस दुर्गम यात्रा में सबसे सुरक्षित सवारी पालकी को मय कहारों के गिरते और क्षतिग्रस्त होते देखा था।
हम सभी सकुशल लौट आये, मातारानी को बार-बार प्रणाम किया, जिनकी कृपा से यह यात्रा सम्पन्न हुई।

रविवार, 18 मई 2014

माँ वैष्णव देवी (अर्धकुंवारी तक का सफ़र)

अमृतसर से कटरा वाया जम्मू लक्ज़री बस से ओवरनाइट यात्रा कुछ थका देने वाली रही। विकल्प यदि ट्रैन चुनी होती तो जम्मू तक तो आराम रहता। हाँ, जम्मू से कटरा तो बस ही मिलती। वैसे जम्मू से कटरा तक एक रेल लाइन का कार्य प्रगति पर है और शीघ्र ही तीर्थयात्री सीधे कटरा तक रेल द्वारा पहुँच सकेंगे। ऐसी सुविधा मुहैय्या कराने के लिये रेल विभाग साधुवाद का पात्र है।
कटरा में होटल हिल व्यू पहले से बुक करवा रखा था, वहाँ की पिक-अप वेन आई और हमें हमारे लगेज के साथ ले गई। होटल पहुँच कर नहाया, तैयार हुए और माँ वैष्णव देवी के मन्दिर प्रवेश हेतु फोटो आई.डी. बनवाया। यह निःशुल्क प्रवेश पत्र छह घंटो तक मान्य होता है। मंदिर तक पहुँचने के लिये लगभग १५-१६ कि.मी. की चढ़ाई रही, पदयात्रियों के लिये सीढ़ियों के अलावा घुमावदार रास्ता था, घोड़े, पालकी और हेलीकाप्टर अन्य विकल्प थे।
हम लोगों ने पैदल माँ के दरबार तक पहुँचने का संकल्प किया, यह जानते हुए कि मुझे और मीना दोनों को पैदल चलने में तकलीफ होती है और नन्हा सहयात्री शौर्य, उसे तो गोद में एप्रन में ले जाना पडेगा।
रास्ते में दस-दस रुपयों की लाठियां मिल रही थी। जब हमने उसे खरीदना चाहा तो मीना ने मना कर दिया, 'हम दोनों एक दूसरे की लाठी (सहारा) बन कर मातारानी के दरबार तक पहुँच जाएंगे'। उसके आत्मविश्वास को सम्मान देते हुए हमलोगों ने एक जयकारा लगाया और आगे बढ़ गये।

भीड़-भाड़, रास्ते में घोड़ों-टट्टुओं की आवाजाही, उनकी लीद से उत्पन्न दुर्गंध, प्रसाद एवं अन्य सामग्री बेचने वालों के दलालों का ढ़ीठ आग्रह, घोड़ों-टट्टुओं और पिट्ठुओं को लेने अनुरोध; प्रथमदृष्टया माहौल अप्रियकर रहा। शनै:-शनै: हम सभी अभ्यस्त हो गये। रास्ते-रास्ते चाय, स्वल्पाहार, ठंडे पेय पदार्थ, प्रसाद, देवी श्रृंगार सामग्री, ड्रायफ्रूट्स की दुकानें। वहीँ जगह जगह बने मसाज सेंटर भी आकर्षण के केन्द्र रहे। मुख्य मंदिर में प्रसाद वहीं से मिलता है अत: हमलोग मातारानी के लिये चुनरी एवं श्रृंगार सामग्री ले लिये। वैष्णव देवी संस्थान द्वारा जगह जगह शेड्स, शौचालय एवं शीतल जल की व्यवस्था थी। हम रुकते-रुकते माँ का गुणगान करते बीच-बीच में पौत्र शौर्य के लिए गोदी बदलते हुए ऊपर की ओर बढ़ रहे थे। दल की कमज़ोर कड़ी तो हम तीन थे- मैं, मीना और मासूम शौर्य। जहाँ हम थोड़े से भी थककर सुस्त होते, काफिला रुक जाता। हमलोग बैठ जाते, शौर्य एप्रन से निकल कर खुले में खेलने लगता और बाकी सदस्य चुट-पुट खाने या सॉफ्ट ड्रिंक्स का बहाना खोज लेते।
यात्रा की चढ़ाई हमें मालूम थी, हमारे पैरों के सामर्थ्य की हमें जानकारी रही। परिवार साथ था अत: बिना किसी चिंता के पाँव-पाँव आगे बढ़ते गए। सच है 

मंज़िल भले दूर हो,
रास्ता हो कठिन। 
कन्धा मिलाकर साथ चले, 
तो कुछ नहीं मुश्किल॥
 
दर्शन कर लौटते श्रद्धालुओं के चेहरे पर ख़ुशी और परितोष हमारा उत्साह वर्धन करती थी। उन्हें देखकर हमलोग माता का जयकारा लगा देते, वे भी माता रानी की जय बोलते हुए आगे बढ़ जाते। लौटने वाले हम लोगों को नहीं जानते थे और न हम उन्हें- परन्तु जब हम उन्हें देखकर मुस्कराते तो उनके चेहरे की ख़ुशी दुगनी हो जाती। वे ऐसा व्यवहार करते मानो हम उनके सगे-सम्बन्धी हों। मुल्ला नसरुद्दीन की यह नसीहत जीवन में कितना काम आती है।  
अर्धकुंवारी पहुँचने के पूर्व ही हमारा दम टूटने लगा। तब वर्षा ने सहजता से एक बात कही- "हमारे आगे बढ़ाये दो कदम माता रानी तक पहुँचने की दूरी कम कर रहे हैं"। हम सभी में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ और माता रानी की जय बोलकर हम आगे कदम बढ़ाने लगे। रास्ते में एक आदमी मिला। उसने हम से पूछा- 'बैक सपोर्ट चाहिए?'। हमारी समझ में नहीं आया कि वह किस 'स्पोर्ट' की बात कर रहा है। विस्तार से पूछने पर उसने पीछे से एक हाथ हमारी कमर पर और एक हाथ पीठ पर लगाया और लगभग धकाते हुए चलने लगा। समझ में आया कि वह पीछे से हमे सपोर्ट देगा, जिससे हमें आगे बढ़ने में कठिनाई नहीं होगी। हम सभी हंसी-ठिठौली के माहौल में आए। सौरभ ने कहा- "कमर का पट्टा बांधकर आना था"। अलीशा बोली- "हमारे राजस्थान में कमर में फेंटा बांधकर चलते हैं"। 'कमर कसना' एक प्रचलित मुहावरा भी है। बात बदलते-बदलते पॉलिटिकल सपोर्ट लीडरशिप तक पहुँच गयी। माहौल को हल्का फुल्का रखने के लिए हम सभी एक दूसरे को बैक सपोर्ट देने लगे और सीखा कि कमर और पीठ सीधा रखकर ऊपर चढ़ने में कम तकलीफ़ होती है।
धीरे-धीरे रुकते रुकाते हम अर्धकुंवारी पहुँच गए। वहाँ पहुँचने पर हमे पता चला कि वहाँ की कैंटीन पहले ही दो घण्टों के लिए बंद हो चुकी थी। वहाँ न बैठने की व्यवस्था थी न खाने की। अंतत: रास्ते में मिल रहे वेफर्स और बिस्कुट से ही काम चलाया।
मंज़िल अभी दूर थी सफ़र अभी भी बाकी था। 

इस कड़ी के अन्य लेख क्रमानुसार इस प्रकार हैं 
५. माँ वैष्णव देवी (अर्धकुंवारी तक का सफ़र)        



रविवार, 11 मई 2014

जलियाँवाला बाग

प्रसिद्ध कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कविता 'जलियाँवाला बाग में बसंत' बचपन से कंठस्थ है-
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैँ शोर मचाते,
काले-काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। 
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे,
परिमलहीन पराग दाग सा बना पड़ा है, 
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है, 
ओ प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे आना 
यह है शोकस्थान यहॉं मत शोर मचाना। 

और इसीलिए, अधिक उत्सुकता रही, उस बाग, उस शहीद स्थल को देख़ने की-जो स्वर्णमंदिर परिसर से बस कुछ कदम की दूरी पर है। बाग़ के बाहर एवं अंदर देशी-विदेशी सैलानियों की अच्छी ख़ासी भीड़ रही। 
प्रवेश के लिए एक बेहद तंग गलियारा, जिसकी दीवार पट्टिका पर लिख है, यहाँ से अंग्रेज़ जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने गोली चलाने का आदेश दिया था। 

तारीख थी १३ अप्रैल १९१९। प्रवेश के साथ ही शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी। इतना बड़ा नरसंहार, जिसमे १००० व्यक्ति काल कवलित हुए और लगभग २००० व्यक्ति घायल हुए। सूचना पटलों पर लिखी इबारतें बतलाती है कि रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन की योजना बनाते लगभग २०,००० व्यक्ति उस पार्क में थे-वृध्द, महिलाएं और बच्चे भी। दिन बैशाखी का था। इतिहास का यह सत्य है कि जनरल डायर ने अकारण निहत्थों पर गोली चलवाई। कहते हैं १० मिनट में १६५० राउंड गोली चली। 
प्रवेश द्वार के समीप शहीदों की स्मृति में एक अमर ज्योति जलती रहती है, जिसे देखकर आँखें नम हो गयी। प्रणाम करते हुए उन अनाम शहीदों को कृतज्ञता ज्ञापित की जिनके महान बलिदान का प्रतिफल-आज हम स्वतन्त्र है।    
पार्क के मध्य में अमेरिकन डिज़ाइनर बेंजामिन पोक का डिज़ाइन किया स्मारक बना है। और इसी के आसपास सुरक्षित संरक्षित है गोली और खून के निशान। हम सभी कल्पना करने लगे कि एक भीड़ पर अचानक गोलीबारी हो तो प्राण बचाने के लिये लोग कैसे-कैसे भागेंगे? जब कोई रास्ता बाहर निकलने एवं भागने को नहीं मिला तो लोग दस फुट ऊंची दीवार पर चढ़ गये। दीवारों पर ऊँचाई तक उभरे निशान इसकी संपुष्ठि करते हैं। बाग़ में बना कुआँ जो अब बन्द है पर लिखा है कि '१२० शव तो कुँए में मिले'। 
इस हत्याकांड ने समूचे देश में एक दहशत पैदा कर दी। ब्रिटिश एक्ट पालन न करने की स्थिति में अंजाम यहाँ तक हो सकता है। गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने क्षुब्ध होकर 'सर' की उपाधि लौटा दी। उधम सिंह ने लंदन जाकर डायर को गोली मारकर काण्ड का बदला लिया। यह अलग बात है कि वे वहाँ पकडे गये और उन्हें मौत के घाट उतारा गया।  
अंग्रेज़ डायर को अपने इस कृत्य पर कोई पछतावा नहीं रहा। यहाँ तक हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने जनरल डायर की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। श्रद्धा के फूल अर्पित कर हमलोग बाग से बाहर आये परन्तु लगभग सौ वर्ष पूर्व के इन कारुणिक दृश्यों ने हमारे मन मस्तिष्क को झिंझोड़कर रख दिया। 
  

शनिवार, 10 मई 2014

अमृत-सरोवर (सर)

सुबह कुछ विलम्ब से हुई। तैयार होकर १० बजे दुर्गिअना मंदिर पहुँचे। स्वर्ण मंदिर के पैटर्न पर बना मन्दिर, चारोँ तरफ़ सरोवर, उसमेँ तैरती रंग बिरंगी मछलियां, मन्दिर में स्थापित भव्य देव प्रतिमायें और राधाकृष्ण सत्संग द्वारा संकीर्तन से निर्मित भक्तिमय वातावरण। श्रद्धाभाव से ओत-प्रोत हमारा अगला पड़ाव रहा श्री हर मन्दिर साहिब, जिसे श्री दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर भी कहते हैं। सिक्खों का पवित्र एवं केंद्रीय पूजास्थल है।
सिक्खों के पांचवे गुरु श्री अर्जुन साहिब ने इसकी संकल्पना एवं डिज़ाइन की तथा निर्माण करवाया। अमृत-सर नाम उस पवित्र सरोवर के कारण पड़ा जिसका निर्माण १५७० में सिक्खों के तीसरे गुरु रामदास ने स्वयं अपने हाथों से किया था। पूरा स्वर्ण मंदिर सफ़ेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गयी है। सिक्ख स्थापत्य-कला का यह बेहतरीन उदाहरण है। दीवारों पर उकेरी इबारतें बतलातीं हैँ कि इस मन्दिर का निर्माण दिसंबर १५८५ से अगस्त १६०४ के मध्य हुआ। इसकी नींव मुस्लिम संत हज़रात मियाँ पीर (लाहौर) ने रखी थी।
काल के थपेड़े खाता यह पवित्र स्थान कई बार क्षतिग्रस्त हुआ परन्तु समर्पित धर्मालम्बियों/कारसेवकों के श्रम से पुन: प्रतिष्ठा स्थापित हो गयी।
शिल्प और सौन्दर्य की अनूठी मिसाल इस मन्दिर की नक़्क़ाशी (इंटीरियर) और बाह्य सुंदरता देखते ही बनती है। गुरुद्वारे के चारों ओर चार दरवाजे हैं जो चारोँ वर्णों के लिये खुले हैं। कट्टरपन्तियों द्वारा जब अनेक मन्दिरों में कुछ जातीयों का प्रवेश वर्जित था, तब यह मन्दिर सर्व-सुलभ था और है।
गुरुद्वारा प्रबन्धन कार्यालय से जानकारी मिली कि यहाँ ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। २२८ कमरे और १८ बड़े हॉल है। साफ़ सुथरी व्यवस्था देखकर लगा कि काश! हमने पूर्व में इंटरनेट पर सर्च किया होता तो यहाँ रुकने का लुफ़्त ले पाते।
सरोवर में लोगों को नहाने/डुबकी लगाने की अनुमति है। सरोवर का पानी लगभग रोज़ बदला जाता है, इसके लिये फिलटरों की व्यवस्था है। पांच से दस वर्षों में पुरे सरोवर की सफ़ाई होती है।
स्वर्णमंदिर परिसर में नंगे सिर प्रवेश की मनाही है। आज दर्शनार्थियों की लम्बी कतार रही। लगभग एक घंटे प्रतीक्षा के बाद पवित्र मन्दिर के गर्भगृह में प्रवेश मिला जहाँ हमने अपने परिजनों सहित पवित्र गुरुग्रंथ साहिब को मत्था टेका और अपना सौभाग्य माना। बाहर आकर अमृत चखा।
स्वर्णमंदिर में आने वाले हर व्यक्ति के लिये यहां लंगर में निःशुल्क प्रसाद की व्यवस्था है। लंगर चौबीस घंटे चलता है। लंगर में खाने-पीने की व्यवस्था गुरुद्वारा प्रबंधन समिति की ओर से नियुक्त सेवादार करते हैं। वे यहाँ आने वाले लोगों (संगत) की सेवा में भी योगदान करते हैं। हमें बतलाया गया कि लगभग ४०,००० लोग प्रतिदिन यहाँ लंगर में भोजन प्रसाद प्राप्त करते है। हमने भी अपने परिजनों सहित लंगर में बैठकर प्रसाद पाया। आत्मा तृप्त हो गयी। धन्यवाद सेवादारों को, प्रबंधन समिति को और वाहेगुरु को। 

शुक्रवार, 9 मई 2014

जस्ट डायल

दिल्ली मीटिंग पॉइंट था। ऋषि लखनऊ से आया, अबीर थाणे से। हम आठ इकठ्ठे होकर अमृतसर को रवाना हुए। हमसे एक चूक हो गयी, शताब्दी के बदले जनशताब्दी का रिज़र्वेशन रहा। धीमी गति, लेट होती ट्रैन और थका देने वाली अंतहीन यात्रा ने घङी की तारीख बदल दी। मौसम भी कुछ नाराज़ था, पानी गिरा, ठंडी हवा चलने लगी।

रास्ते में सहयात्रियों से चर्चा की कि अमृतसर में कहाँ रुकें? उन्होंने बतलाया वीकएंड होने से वहाँ बहुत भीड़ है। स्वर्ण मंदिर में जगह है ही नही, आसपास के हॉटेल भी फुल हैं। रात्रि के १:०० बजे हम परिजनों के साथ कहाँ भटकें! अचानक सौरभ को याद आया 'जस्ट डायल' 8888888888, अपना बजट, यात्री संख्या और लोकेशन बतलाई। तुरंत ही हमारे पास ४-५ हॉटेल के नंबर/नाम एस.एम.एस पर आ गये। हमलोग उन्हें देख ही रहे थे कि एक हॉटेल का कॉल आ गया। चर्चा हुई, हॉटेल का पता और स्टेशन से ऑटो पकडकर पहुँचने की सलाह भी दी। जान में जान आई।

जैसे-तैसे अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। परन्तु वहाँ का नज़ारा कुछ अलग ही दिखा। पानी ने वहाँ की फ़िज़ा ही बिगाड़ दी। सर्वदा पानी ही पानी। विलम्ब से एक ऑटो मिला, परन्तु वह अपने नियत हॉटेल ले जाने ही राज़ी हुआ। ख़ैर उसका मन रखने के लिये हमने दो-तीन हॉटेल देखे। सीमित चॉइस, मनमाफ़िक दरें; रात्रि में नये अजनबी शहर में अपनी मन मर्ज़ी नहीं चल पाती।  ऑटो वाला बार-बार उन्हीं हॉटेल में ठहरने पर ज़ोर दे रहा था। शायद, उसका अपना निजी स्वार्थ रहा। मजबूरन हमें जस्ट डायल पर सम्पर्क हुए नंबर पर ऑटो चालक की बात करानी पडी। वह कुड़कुड़ाता हुआ हमें हमारे नियत ठिकाने पर ले गया। आश्चर्य! जहाँ हम ऑटो चालक से बहस में उलझे थे, उससे चन्द कदमों पर वह हॉटेल था जहाँ हमें जाना था, बड़ा सा, आलीशान।बस, मुख्य सड़क से हटकर लिंक रोड पर था। खैर! हॉटेल पहुँचने पर वहाँ का मैनेजर दरवाजे पर खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था, उसने बताया कि हम लोगों की बातचीत हॉटेल मालिक से हुई थी। उन्हीं का अभी फ़ोन आया था कि जबलपुर से आए हमारे मेहमान हॉटेल पहुँचे अथवा नहीं। थैंक्स! परदेस में इतना रिस्पांस। हॉटेल, वहाँ का मैनेजमेंट, देर रात में खाये गरम-गरम पराठे और सुकून से आयी नींद---याद रहेगी।     

रविवार, 4 मई 2014

दिल्ली राज्य

हमारी ट्रैन फरीदाबाद की सीमा पार कर रही थी, अचानक एक चॅनेज-स्टोन पर पढ़ा "दिल्ली राज्य"। मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ से लेकर अरविंद केजरीवाल तक एक-एक चेहरे घूम गये। कहने को दिल्ली दिल वालों की है, परन्तु यहाँ बादशाहों को भी दो गज ज़मीन दफ़न के लिये नहीं मिली। पूरे देश का संयोजन, नियंत्रण और संचालन दिल्ली से ही होता है। यहाँ कई बार आया गया हूँ। कई-कई दिन कनॉट पैलेस और पालिका बाज़ार में घूमकर बिताए हैं। नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली की समरसता देखी है। परन्तु, इस बार दिल्ली कुछ बदली सी दिखी, डरी सी। सहमी सी!! क्यों? कह नहीं सकता।

हाँ, यह हो सकता है कि पिछली विधान सभा में दिल्लीवासियोँ ने लीक से हटकर भ्रष्टाचार हटाने का वादा करती आप (आम आदमी पार्टी) को विश्वास मत दिया। परन्तु, वे (आप) कसौटी पर कमज़ोर साबित हुए। 'आप' के नेता दिल्ली को बीच मझधार में छोड़कर भाग खड़े हुए। वैसे माना जाता है कि 'आप' सरकार चलाने की अभ्यस्त नहीं थी। आन्दोलन-प्रदर्शन के आदि 'आप' के कार्यकर्ता सत्तासीन होने पर केंचुली नहीं बदल पाये। इसमें कौन दोषी है?

  • दिल्ली का आम मतदाता, जिसने परिवर्तन चाहा। 
  • 'आप' के आलाकमान, जिन्होने दिल्लीवासियों को झुनझुना पकड़ाया, और उसे भी छीन लिया।
  • सत्ता के वे बिचौलिये, जो 'आप' के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधते रहे।  
लेकिन सबसे ज़्यादा दोषी 'आप' के सरगना अरविन्द केजरीवाल ही माने जाएंगे। आनन-फानन दिल्ली राज्य की कुर्सी से पल्लू झटकते हुए पूरे देश पर कब्जा करने का दिवा-स्वप्न देखने लगे। अदूरदर्शीपूर्ण निर्णय! एक प्रदेश जिससे नहीं संभला, वह एक देश को कैसे संभालेगा? दिल्ली वालों ने जोश, जज़्बे, जुनून को वोट दिया था। भ्रष्टाचार के विरुध्द तथाकथित लड़ाई लड़ने वालों को चुना था। डर कर भागने वाले दिल्ली पर शासन नहीं कर पाते, इतिहास साक्षी है।
दूसरे, दिल्ली इसलिए भी सशंकित है कि १६ मई को नयी केंद्रीय सरकार का मुखौटा कौन सा होगा? देश की जनता ने 'वासुकी' और 'तक्षक' के मध्य फैसला किया है, दोनों विषधारी हैँ। भाजपा के नरेन्द्रमोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो सकते हैं (देश में बना मीडियाई प्रसार यही दर्शाता है)। वे गुजरात के विकास का मॉडल लेकर शहर-शहर में जता रहे हैं कि उन्होने गुजरात की कायापलट कर दी; उसी तर्ज पर वे समूचे देश में बदलाव लाएंगे। हो सकता है, उनका मिशन 272+ कामयाब हो। हो सकता है वे और उनके समर्थक उस जादुई आंकड़े को सहजता से पा लें। परन्तु यह किसी व्यक्ति या पार्टी की उपलब्धि नहीं होगी वरन आम जनता का पिछली सरकार की नाकामयाबी पर प्रदर्शित रोष होगा। डर यह भी है कि यदि मोदीजी येन केन प्रकारेण केंद्रीय सत्ता हथिया भी लेते हैं तो-
दिल्ली राज्य का मतदाता/आम आदमी का दिल भी देश के साथ धड़कता है। अभी-अभी दूध से जला था, छाँछ को भी फूँककर पी रहा है। शायद आने वाली १६ मई, एक स्थाई केंद्रीय सरकार दे और दिल्ली वासियों को राज्य के निर्वाचन हेतु पुनः दुविधा की स्थिति से ना गुजरना पड़े। यही सोचते-सोचते नई दिल्ली आ गयी। रेल विभाग की बेहतरीन योजना 'घंटी बजाओ-खाना खाओ' कमसम के टोल फ्री नंबर '11 47-100 100' पर पिछली स्टेशन से लंच बुक किया था। जिसे यहाँ हमारी बर्थ पर सर्व किया गया। हम लोगों ने सुस्वाद भोजन प्राप्त किया। ऋषि लखनऊ से आकर हमें जॉइन कर चुका था। 
हम आगे की यात्रा के लिये निकल पड़े थे।