मंगलवार, 3 मार्च 2015

विक्रम, कि जिनका संवत यहाँ पर चल रहा

अनुश्रुत विक्रमादित्य ईसवी पूर्व 102 से ईसवी 15 तक उज्जैन (भारत) के राजा रहे वे ज्ञान, वीरता और उदारशीलता की व्यक्तित्व-त्रयी थेदेवभाषा (संस्कृत) हो या भारतीय अन्य भाषाएँ, दादी-नानी के किस्से-कहानियां हों या किस्सागोई की अबूझ-पहेलियाँ, चारण-भाटों की बखानी बिरादावालियाँ हों या वाक्यानाविशों की गढ़ी इबारतें, कालपात्र हों या कीर्ति-स्तम्भ-सम्राट विक्रमादित्य की भूरी-भूरी प्रशंसा करते नहीं अघाते
सूबेदार भगवानदीन सिंह सोमवंशी के अनुसार— मालवा का प्रसिध्द राजा गंधर्वसेन था.इसके तीन पुत्रों में शंख अल्पायु में ही मर गया, भरथरी योगी हो गया और विक्रमादित्य गद्दी पर बैठाकथा–सरित्सागर के अनुसार वे, परमार वंश के राजा महेंद्रदित्य के पुत्र थे

विक्रम का वंश-परिचय

वंश—सूर्य वंश
शाखा—परमार
गौत्र-वसिष्ठ
प्रवर-वसिष्ठ, अत्रि, सांकृति
वेद-यजुर्वेद
सूत्र-पारस्कर गृह्यसूत्र
कुलदेवी-कालिका
वृक्ष-पीपल
प्रमुख गद्दी-उज्जैन

सम्राट विक्रमादित्य युद्ध-कला एवम शस्त्र-संचालन में निष्णात थे उनका सम्पूर्ण संघर्षों से भरे अध्यवसायी जीवन विदेशी आक्रान्ताओं, विशेषकर शकों के प्रतिरोध में व्यतीत हुआअंततः ईसा पूर्व 56 में उन्होंने शकों को परास्त किया, शकों पर विजय के कारण वे ‘शकारि’ कहलायेऔर इस तरह ‘विक्रम-युग’ अथवा ‘विक्रम-सम्वत’ की शुरुआत हुईआज भी भारत और नेपाल की विस्तृत हिन्दू परम्परा में यह पंचांग व्यापक रूप से प्रयुक्त होता हैविक्रमादित्य के शौर्य का वर्णन करते हुए समकालीन अबुलगाजी लिखता है— जहाँ परमार विक्रम का दल आक्रमण करता था वहाँ शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते थे और शत्रुदल मैदान छोड़कर भाग जाते

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन थीपुराणों एवम अन्य इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि अरब और मिश्र भी विक्रमादित्य के अधीन थेविक्रमादित्य की अरब-विजय का वर्णन कवि जरहम किनतोई की पुस्तक सायर-उल-ओकुल में हैतुर्की की इस्ताम्बुल शहर की प्रसिध्द लाइब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में यह ऐतिहासिक ग्रन्थ है, उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है–
वे लोग भाग्यशाली है जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम केराज्य में जीवन व्यतीत कियावह बहुत दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था,जो हरेक व्यक्ति के बारे में सोचता थाउसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच में फैलाया अपने देश के सूर्य से भी तेज विव्दानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सकेइन विव्दानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया हैये  विक्रमादित्य के निर्देश पर यहाँ आये
यह शिलालेख हजरत मुहम्मद के जन्म के 165 वर्ष पहले का है

विक्रमादित्य का प्रशस्ति-गान करती दो पुस्तकें आम प्रचलन में हैं-
1.बेताल पच्चीसी (बेताल पञ्चविंशति) इसमें पच्चीस कहानियाँ हैंजब विक्रमादित्य विजित बेताल को कंधे पर लाद कर ले जाने लगे तो बेताल उन्हें एक समस्यामूलक कहानी सुनाता है शर्त रहती है कि उसका समाधान जानते हुए भी यदि राजा नहीं बताएँगे तो उनके सिर के टुकडे-टुकडे हो जायेंगे और यदि राजा बोला तो बेताल मुक्त हो कर पेड़ पर लटक जावेगा राजा ज्ञानवान थे, बुध्दिमान थे, वे समस्या का सटीक समाधान जानते थेकहानियों का सिलसिला यूँ ही, चलता रहता है

2.सिंहासन बत्तीसी (सिंहासन द्वात्रिंशिका) परवर्ती राजा भोज परमार को 32 पुतलियों से जड़ा स्वर्ण-सिंहासन प्राप्त हुआजब वे उस  पर  बैठने लगे तो उनमे से एक-एक कर पुतलियों ने साकार होकर सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, प्रजावत्सलता,वीरता से भरी कहानियाँ सुनाई और शर्त रखी कि यदि वे (राजा भोज) पूर्वज विक्रमादित्य के समकक्ष हैं, तभी उस सिंहासन की उत्तराधिकारी होगें! एम.आई.राजस्वी की पुस्तक राजा विक्रमादित्य के अनुसार, विक्रमादित्य को यह सिंहासन देवराज इंद्र ने दिया, जिसमें स्वर्ग की 32 शापित अप्सराएँ पुतलियाँ बनकर स्थित थीं, जिन्होंने अत्यंत निकट से देखी थी विक्रमादित्य की न्यायप्रियता

सम्राट विक्रमादित्य का सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से ऐसी घटना या स्मारक से जोड़ दिया जाता है, जिसका ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हैजैसे कि, एक बार एक तांत्रिक अष्ट सिध्दियों को प्राप्त करने के लिए सर्वगुण संपन्न विक्रमादित्य की बलि देना चाहता था वह तो भला हो बेताल का, जिसने विक्रमादित्य की न्यायप्रियता से उसे सत्य रहस्य बता दिया बेताल का यह स्वार्थ रहा कि तांत्रिक के मरते ही वह भी मुक्त हो जायेगा राजा विक्रमादित्य ने युक्ति से काम लिया और तांत्रिक का सिर काटकर यज्ञाग्नि के हवाले कर दिया- और राजा को अष्ट-सिध्दियां प्राप्त हो गयीं

विक्रमादित्य स्वयं गुणी थे और विव्दानों, कवियों, कलाकारों के आश्रयदाता थे उनके दरबार में नौ प्रसिध्द विव्दान- धन्वन्तरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, बेतालभट्ट वररूचि और वाराहमिहिर थे, जो नवरत्न कहलाते थेराजा इन्हीं की सलाह से राज्य का संचालन करते थेभविष्य-पुराण में आया है—
धन्वन्तरिः क्षपनकोमरसिंह शंकू बेतालभट्ट घटकर्पर कालिदासः.
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सम्भायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य
धन्वन्तरी औषधिविज्ञान के ज्ञाता रहे,कवि कालिदास राजा के मंत्री रहे और वराह्महिर ज्योतिषविज्ञानी उज्जैन तत्कालीन ग्रीनविच थी, जहाँ से मध्यान्ह की गणना की जाती थीसम्राट वैष्णव थे पर शैव एवम शाक्त मतों को भी भरपूर समर्थन मिला तब, संस्कृत सामान्य बोल-चाल की भाषा रही

विक्रमादित्य के समय में प्रजा देहिक, देविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थी चीनी यात्री फाहियान लिखता है– देश की जलवायु सम और एकरूप हैजनसँख्या अधिक है और लोग सुखी हैं राजधानी उज्जैन की शोभा का वर्णन करते हुए कवि कालिदास ने लिखा है —यह नगर स्वर्ण का एक कांतिमय खंड था, जिसका उपभोग करने के लिए उत्कृष्ट आचरण वाले देवता अपने अवशिष्ट पुण्यों के प्रताप के कारण स्वर्ग त्याग कर पृथ्वी पर उतर आये थे

इतिहास में ऐसे अन्य राजाओं और सम्राटों की चर्चा आती है, जिन्हें विक्रमादित्य का विरुद (टाइटल) लगा या लगाया गया, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमू के नाम से प्रसिध्द है)परन्तु जिन विक्रमादित्य का हम गुणगान कर रहे हैं, वे भारत-भारती (मैथली शरण गुप्त) के अनुसार-

विक्रम कि जिनका आज भी संवत यहाँ पर चल रहा,
ध्रुव-धर्म के ऐसे नृपों का उस समय भी बल रहा
नर रूप रत्नों से सजी थी वीर विक्रम की सभा,
अब भी जगत में जागती है जगमयी जिनकी प्रभा
जाकर सुनो उज्जैन मानो, आज भी यह कह रही,
मैं मिट गई पर कीर्ति मेरी तब मिटेगी जब मही

सोमवार, 2 मार्च 2015

यूँ इक चर्चा, ग़ज़ल पर

प्री-इस्लामिक अरब में ग़ज़ल का अस्तित्व नहीं मिलतादसवीं सदी के आसपास वहाँ प्रचलित ‘परशियन कशीदो’ को ग़ज़ल का जन्मदाता माना गयामध्यकाल में अमीर ख़ुसरो (१२३५-१३२५) ने—
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ
किसे पड़ी है कि जो सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियाँ
जैसी ग़ज़लों को गाते हुए ‘हिंदी’ एवम् ‘हिन्दुस्तान’ में प्रवेश किया

उर्दू में ग़ज़ल-उर्दू में काव्य की प्रचलित विधाओं में ग़ज़ल को ‘दिव्यास्त्र’ माना गया हैअरबी-फारसी के छंद-विधान, भाव-सम्पदा और विचार-दृष्टि की छाया में फूली-फली ग़ज़ल ‘उर्दू ग़ज़ल’ या ‘परंपरागत ग़ज़ल’ कहलाती हैअपने जन्म से लेकर अब तक इसमें सबसे ज्यादा प्रयोग तथा परिवर्तन हुएबाबजूद इसके, वह आज भी जीवंत है और उसकी लोकप्रियता किसी भी प्रकार कम नहीं हुई है

उर्दू ग़ज़लों का केन्द्रीय भाव ‘प्रेम’ होता हैउसमें एक मतला होता है, एक मक्ता होता है और इनके बीच में पांच से बारह तक अशआर (शे`र का बहुबचन) होते हैं रदीफ़ और काफिये (तुकांत) के बिना ग़ज़ल की बुनाबट सम्भव नहीं और तखल्लुस (उपनाम), वह तो शायर को अदब की दुनिया में नाम और पहिचान दोंनों दिलवाता हैएक अनिवार्यता अवश्य है, ग़ज़ल के सभी शे`र हमवजन, अर्थात एक ही बहर में होना चाहिएएक शे`र दूसरे से स्वतन्त्र हो सकता है हाँ ! जब ग़ज़ल के सभी अशआर में एक ही भाव शुरू से आखिर तक चलता गया हो, उसे ‘मुसलसल ग़ज़ल’ कहते हैंबहादुर शाह जफ़र की तीन अशआर की मुसलसल ग़ज़ल इस प्रकार है
नहीं हाले-देलही सुनाने के काबिल
ये किस्सा है रोने रुलाने के काबिल
उजाड़े लुटेरों ने वो कस्र इसके
जो थे देखने दिखाने के काबिल
न घर है, न दर है, रहा इक ‘जफ़र’ है
  फ़कत हाले देलही सुनाने के काबिल                                                                                                     
 उल्लेखनीय है कि इक़बाल, वाली, आतिश, मीर, ग़ालिब, मोमिन, जौक, दर्द, दाग, अल्ताफहुसैनअली, जिगर मुरादाबादी, फ़िराक, मजरुह सुल्तानपुरी, अख्तर, कमर जलालाबादी, साहिर लुधियानवी और साज जबलपुरी आदि शायरों ने उर्दू ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा मलिका-ए-ग़ज़ल’ बेगम अख्तर (2014, उनका जन्म शताब्दी वर्ष है) ने मंच, मुशायरों एवम फिल्मों में ग़ालिब, मीर, मोमिन, जौक, फ़िराक, फैज अहमद फैज आदि-आदि ग़ज़लकारों की गज़लें गाकर जनप्रचारित की; और बाकायदा ‘गंडा बांधकर’ ग़ज़ल-गायिकी के क्षेत्र में शिष्य-परम्परा प्रारंभ कीशकील बदायूँनी की ग़ज़ल, ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’ बेगम अख्तर की गायिकी का एक हद तक पर्याय ही बन गयी थी

हिन्दी में ग़ज़ल-हिन्दी में ग़ज़ल के तीन प्रचलित स्वरूप हैं-
१—क्लासिकल (शास्त्रीय) ग़ज़ल-ऐसी ग़ज़ल, जो परम्परागत बहर (उर्दू छन्द-विधान के अनुसार) या उससे मिलते-जुलते हिन्दी के वर्णिक छंद पर आधारित हो, मीटर में कसा एक मतला (गज़लोदय) हो, भिन्न-भिन्न भाव-भूमियों पर कहे पांच-सात अशआर (शे`र) हों, और अंत में चमत्कृत कर देने वाला मक्ता (ग़ज़ल-इति) होसंगीत की स्वर लहरियों पर थिरकते काफिये होंतखल्लुस (नाम की छाप) हो तो ठीक, न हो तो भी ठीकमहाभाव प्रेम-सौन्दर्य या अध्यात्म से सराबोरपरंपरागत प्रतीक यथा, हुस्नो-शबाब, जामो-मीना, महबूब-माशूका इत्यादि इत्यादि का प्रयोगअरबी-फारसी के भारी-भरकम शब्द या संस्कृत की तत्सम शब्दावलियाँनिराला की पूर्ववर्ती पीढ़ी में शम्भुनाथ ‘शेष’, रूपनारायण त्रिपाठी, रुद्र काशिकेय, गुलाब, बलवीर सिंह ‘रंग’, शिशु, चिरंजीत और नर्मदा प्रसाद खरे के नाम सम्मानित ग़ज़लकारों की सूची में हैंउस समय की अधिकांश गज़लें उर्दू के निकट थींदुष्यंत की शुरुआती गज़लें कुछ ऐसी ही थीं-
    कैस की लैला या फ़रहाद की शीरी कह दो,   
हम नहीं राँझा, मगर हीर से बातें की हैं
‘रंग’ का रंग ज़माने ने बहुत देखा है,
क्या कभी आपने बलवीर से बातें की हैं
                                          (रंग की ग़ज़ल का एक शे`र और मक्ता)
हमने जो चखी तो बुरी लगी
कडवी तुम्हें लगेगी, मगर एक जाम और
                                          (दुष्यंत की ग़ज़ल का एक शे`र)
नीरज की गीतिकाओं में उर्दू की स्पष्ट छाप है सूर्यभानु गुप्त, बालस्वरूप ‘राही’, शेरजंग गर्ग और भवानीशंकर मालपानी भी उर्दू के सम्मोहन से नहीं बच पाये—
आदमी खुद को कभी यूँ भी सजा देता है,
रोशनी के लिए शोलों को हवा देता है
             (नीरज)
चंद्रसेन ‘विराट’ ने मुक्तिकाओं के माध्यम से ग़ज़ल का नया अन्दाज काव्य-क्षेत्र में प्रस्तुत कियाउन्होंने उर्दू बहर से लयात्मक साम्य रखने वाले हिंदी के मात्रिक छंदों का प्रयोग कियाउनकी मुक्तिकाओं में उनकी ‘गीतात्मक आस्था’ विद्यमान हैदेखिये एक 16 मात्रिक मुक्तिका, जो भावोदय से अंत तक एक ही भाव में लिखी गयी है—
फिर पुष्पित वन्य पलाश पिया,
फागुन मांगे भुजपाश पिया
वन-वन कूके कोयल प्रिय की,
उसको है तीव्र तलाश पिया
तन थाप रहा उपले, मन
बुनता सपनों के पाश पिया
सखियों के कंत सभी लौटे,
तुम भी आ जाते काश ! पिया

2-मिश्रित (खिचड़ी) ग़ज़ल-स्वतंत्रोतर भारत में ग़ज़ल (उर्दू/हिंदी) कवि-सम्मेलनों/मुशायरों में खूब पसंद की गईछोटे-छोटे शे`रों में अपनी बात कहती-सुनती ग़ज़ल जहाँ चाहे रुक जातीमंच की दाद, श्रोताओं की वाह!-वाह!!, वन्स-मोर की आवाजें, सीटियाँ, तालियाँ---------रातों-रात गज़लकार बनने और प्रसिध्दि पाने के चक्कर में हिंदी के दिग्भ्रमित युवा, अरबी- फारसी की बहरें सीखने लगे और गलत-सलत देवनागरी में गज़लें लिखने लगेउन्हें न हिंदी का ठीक से ज्ञान रहा, न बहर न मतला-मक्ता की पहिचान बस ! काफिये मिलाकर ग़ज़ल का आकार गढ़ा जाताढ़ेरों गज़लें, अनगिनत गज़लकार, बहुत से ग़ज़ल-संग्रहयह वही समय था, जब हिंदी कविता- ‘अकविता’, ‘छंद की वापिसी’ जैसे आंदोलनों से जूझ रही थीगज़लकार/कवि या ग़ज़ल- विशेष को संदर्भित किये बिना यह कहना उचित होगा कि ये वे गज़लें थीं, जिन्हें उर्दू के उस्तादों ने सिरे से नकारा, ‘वर्णसंकरी’ कहा, और तो और हिंदी के प्रकाण्ड-पण्डितों ने ‘अरबी-फारसी से आयातित’ मानकर सौतेला व्यवहार कियाखैर, जब कोई विधा अधिक लिखी जाती है तो ‘अति-वर्जयेत’– उसमें प्रदूषण आना स्वाभाविक हैधीरे-धीरे मैल (गन्दगी) छँट जाती है और स्तरीय लेखन शेष रह जाता है

3-नव ग़ज़ल-ग़ज़ल पर लगे आरोपों-प्रत्यारोपों के बाद हिंदी कवियों ने अपने को सम्भालासर्व प्रथम उन्होंने अपने-आप को उन तथाकथित उस्तादों के मकडजाल से मुक्त किया, जिनकी शागिर्दगी में उर्दू-अदब की आधी-अधूरी तालीम ले रहे थे फिर हिंदी के वार्णिक एवम् मात्रिक छन्दों का ग़ज़लों में विधिवत प्रयोग प्रारम्भ कियाआज रोला, सोरठा, सवैय्या, मदाक्रांता, गीतिका, हरिगीतिका, दोहा और हाइकू छंद ग़ज़ल में बहु-प्रचलित हैंसाथ ही, इनकी भाषा में एक मध्यम-मार्गीय सहजता दिखाई देती हैयानि इनमें जहाँ एक ओर तत्सम शब्दावली सम्पन्न भाषा को अस्वीकार किया, वहीं ग़ज़ल के फारसीपन से भी अपना दामन छुड़ाया हैसत्यप्रकाश शर्मा की ग़ज़ल में आक्रोश और विद्रोह के स्वर ही नहीं, आशा और विश्वास की अनुगूँज भी है और समत्व का अनुरागी भाव भी-
सबकी खुशियों की चाह करते हैं,
कौन सा हम गुनाह करते हैं
किस तरह जाल को उड़ें लेकर,
कुछ परिन्दे सलाह करते हैं
नये ज़माने के साथ विज्ञान व्रत, दीक्षित दनकौरी, मिर्जा हसन नासिर, दरवेश भारती, आचार्य भगवत दुबे, भगवानदास जैन, अशोक अंजुम, शिव ओम अम्बर, सागर मीरजापुरी, डॉ महेंद्र अग्रवाल आदि स्तरीय गज़लें गा रहे हैं  
                                                                  
उक्त चर्चा का सार यह है कि उन्नीस अरेबिक बहरों के सांचे में ढली, उर्दू में कही ग़ज़ल ‘परम्परागत ग़ज़ल’ या ‘ग़ज़ल’ कहलाती है जबकि इन्हीं बहरों के छंदानुशासी तख्तीअ या उनके समतुल्य हिन्दी के वार्णिक व मात्रिक छन्दों में गाई ग़ज़ल को ‘हिन्दी-ग़ज़ल’ कहते हैंसायुज्य है कि दोनों की लिपि देवनागरी होती हैयह भी सर्व-सत्य है कि ग़ज़ल को ‘आम-आदमी’ तक पहुँचाने की पहल दुष्यन्त ने की थीवे उर्दू-हिन्दी के सांप्रदायिक झमेले में नहीं उलझेदुष्यन्त ने ग़ज़ल को ग़ज़ल ही माना, ’उर्दू- ग़ज़ल’ अथवा ‘हिन्दी-ग़ज़ल’ नहीं बकौल दुष्यन्त— “मेरी नीयत और कोशिश यह रही कि इन दोनों भाषाओँ को ज्यादा से ज्यादा निकट ला सकूँइसलिए ये गज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ-
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

कमलेश्वर भी ग़ज़ल को ‘हिन्दी’ या ‘हिन्दू’ का जामा नहीं पहनाना चाहते थे शायद इसलिए, उन्होंने उर्दू-हिन्दी के 100 से अधिक शायरों की श्रेष्ठ ग़ज़लें सम्पादित की और संकलन-श्रंखला का नाम रखा ‘हिन्दुस्तानी गज़लें’गोया इनका आकार भी हिन्दुस्तानी है और निधि भी हिन्दुस्तानी हैयहाँ तक तो ठीक है, लेकिन मुंगेर के अनिरुध्द सिन्हा का ख्याल है कि-“हमने ग़ज़ल का काव्य-रूप हिन्दी में अंगीकार किया है,इसलिए ग़ज़ल के पहले ‘हिन्दी’ जोड़ना उचित होगा तब सोचना पड़ा कि ऐसा क्यों? अरे ! हमने अरब-फारस से आई संस्कृति और वहाँ के लोगों को ‘नीर-क्षीर’ सदृश स्वीकार कर लिया हैउसे/उन्हें इस देश में स्थापित होने के लिए कोई पृथक पहचान नहीं दी

देखा जावे तो दुष्यन्त के पूर्व उर्दू ग़ज़ल-हिन्दी ग़ज़ल जैसा कोई विवाद नहीं था 1976 में कमलेश्वर व्दारा सम्पादित ‘सारिका’ के ‘दुष्यन्त स्मृति विशेषांक’ ने हिन्दी ग़ज़ल के पक्ष में पाठकों-प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग तैयार कर दिया, सामाजिक सरोकारों से सम्बध्द ग़ज़लों से एक नये युग की सम्भावित शुरुआत ने कुछ कट्टरपंथियों का हाजमा ख़राब कर दिया और उससे उत्पन्न असहज भाव ग़ज़ल एवम हिन्दी ग़ज़ल के मध्य गहराती खाई का प्रमुख कारण बनारसूल अहमद ‘सागर’ लिखते हैं कि “ग़ज़ल अरबी से फारसी,फारसी से हिन्दी तथा हिन्दी से उर्दू में आयीलेकिन हिन्दी में ग़ज़ल का वर्तमान स्वरुप परम्परागत (उर्दू) ग़ज़ल से सीधा प्रभावित दिखाई देता हैजैसे कि-
      1.      ग़ज़ल के कारण उर्दू और हिन्दी ‘दो सगी बहिनों’ जैसी नजदीक आईं.उर्दू की नफ़ासत और रूमानियत ने काव्यकारों को प्रभावित किया, वहीं उर्दू की शब्दावलियाँ हिन्दी में आसानी से आत्मसात कर ली गई
      2.      ग़ज़ल पढ़ने-लिखने के लिए लोगों ने अरबी-फारसी और उर्दू सीखीउर्दू ग़ज़लों के चुनिन्दा दीवान हिन्दी में भाष्यांतरित किये/कराये गये, इस प्रकार हिन्दी के साहित्यागार में श्री-वृध्दि हुई
      3.      ग़ज़ल की गहराई को समझने के लिए लोगों ने सूफी विचारधारा का विशद अध्ययन किया
      4.      हिन्दी में उर्दू-अदब की तरह इस्लाह (शागिर्द का अपनी काव्य-रचना दिखाने पर उस्ताद व्दारा उसमें किया गया कलात्मक संशोधन/सुधार) की परम्परा की आवश्यकता महसूस की जा रही हैसाज जबलपुरी (जबलपुर), चन्द्रसेन ‘विराट’ (इन्दौर), तथा स्वामी श्यामानंदन सरस्वती ‘रौशन’ (नई दिल्ली) ने अपनी संथागत संगोष्ठियों के माध्यम से अनुज-ग़ज़लकारों को आदर्श ग़ज़ल के गुर सिखाने के प्रशस्त-प्रयास किये ‘साज’ और ‘रौशन’ अब इस दुनिया में नहीं रहे, परन्तु विराट की ग़ज़ल-पाठशाला बदस्तूर जारी है दरवेश भारती (सम्पादक-ग़ज़ल के बहाने) डॉ महेंद्र अग्रवाल (सम्पादक-नई ग़ज़ल) और भानुमित्र (सम्पादक-ग़ज़ल गरिमा) व्दारा भी ग़ज़ल के पक्ष में स्तुत्य कार्य किये जा रहे हैं
     5.      हिन्दी काव्य में ग़ज़ल के रूप में छंद की वापिसी हुई है, लय की वापिसी हुई हैकविता का सहज स्वीकार बढ़ा हैछंद मुक्त कविता की ओर मुडती काव्यधारा ग़ज़ल विधा को पाकर आकृष्ट भी हुई और आश्वत भी
     6.      ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य पर केन्द्रित कवि अब नये प्रतीक, बिम्ब और मिथकों के माध्यम से हिन्दी काव्य में चमक एवम् चुटीलापन लाने के प्रयास कर रहे हैंयह ग़ज़ल का हिन्दी काव्यधारा पर विशिष्ट प्रभाव है                                        

न चाहते हुए भी उर्दू ग़ज़ल के कुछ विधागत दोष हिन्दी की ग़ज़लों में पाये जा रहे हैंजैसे कि-
   अ)   उर्दू के छंद विधान में जरुरत के अनुसार मात्रा घटाकर शब्दों,शब्दांशों और उनके समूहों को सही रुकन के वजन में लाया जा सकता है
   आ) उर्दू गज़लों में ‘अलिफ़’ का काफिया ज्यादातर प्रयोग होता रहता है, ग़ालिब का ‘अन्दाजे-बयाँ’ कुछ इस तरह है-
दिल-ए- नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
इसमें हुआ, दवा बगैरह बगैरह में अलिफ़ का काफिया इस्तेमाल हैऐसी ही दुष्यन्त ने एक ग़ज़ल कही-
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोका हुआ होगा
इसमें दुहरा, धोका इत्यादि में अलिफ़ के काफिये प्रयुक्त हैं
वैसे, हिन्दी ग़ज़ल के विस्तृत प्रभा-मण्डल ने उर्दू ग़ज़ल को भी गहरे तक प्रभावित किया और उस (उर्दू-ग़ज़ल) में कुछ आमूलचूल परिवर्तन दिखाई दिए; जैसे कि-
गज़लें अब ‘गजाल-चश्म’ (इम्प्लाइड अर्थ-मृगनयनियों से बातचीत) से हटकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ गयीं हैंअब तो राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानि क,ऐतिहासिक एवम् पौराणिक विषयों पर गज़लें लिखीं जा रहीं हैं
·         बड़े-बड़े शायरों की शायरी देवनागरी में छप रही हैवे अब हिन्दी में लिख रहे हैंडा.बशीर बद्र का एक दीवान है, ‘आस (वाणी प्रकाशन से प्रकाशित)-जिसका मशहूर शे`र है---
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये
·        
   कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का ‘गंगा-जमुनी’ रूप अक्सर देखने को मिलता हैमुशायरों में शायर हिन्दी ग़ज़ल पढ़कर वाह-वाही लुटते हैंफिल्मों में ग़ज़लों के अपने रंग और शेड्स हैं
·         स्कूल एवम् स्नातक स्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में रंग, नेपाली, बच्चन, दुष्यंत, नीरज और विराट जैसे ग़ज़लकार हैंदुष्यंत की -‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए’ मध्यप्रदेश में कक्षा ११ के कोर्स में तथा विराट की-
                 
‘करने वालों ने की होगी पर अब कुरवानी कौन करे,
                   सत्ता छोड़ सड़क पर आये यह नादानी कौन करे’     
(साहित्य-कलश/पृष्ठ129)
महाराष्ट्र के कालेज में पढाई जा रही सुप्रसिध्द गज़ल हैअलावा इसके, देश के विभिन्न- विश्वविद्यालय चुनिन्दा ग़ज़लकारों और उनकी विविध-आयामी ग़ज़लों पर अति महत्त्वपूर्ण शोध कार्य करा रहे हैं, यह ग़ज़ल के पक्ष में शुभ- संकेत है
·         पड़ोसी देश पाकिस्तान में दोहा-ग़ज़ल की अच्छी पूंछ-परख हैसहबा अख्तर की एक दोहा ग़ज़ल का मतला इस प्रकार है

कब तो स्वयंवर दिन आयेगा, होगा अंत वियोग,
सपनों की संजोगिता,तुझसे कब होगा संजोग

हाँ! वहाँ दोहा-छंद प्रयोग की अपनी सीमाएं भी हैं और स्वतंत्रता भीतभी तो आचार्य भगवत दुबे कहते हैं-“परम्परागत बहरों से बाहर निकलने की छटपटाहट में ग़ज़लदा ‘दोहा-ग़ज़ल’ का फार्मेट पाकर राहत की साँस ले रहे हैं
·         उर्दू ग़ज़ल में अब सादगी को पसंद किया जाने लगा है आम बोलचाल की भाषा, उसमें देशज और क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग देखने मिलता हैअब साफ-सुथरी, धीर-गंभीर और नवीन विचारों से युक्त समसामयिक गज़लें कही जा रही हैं
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   ग़ज़ल में अब नये प्रयोगों को मान्यता मिलने लगी हैमकता के नियम शिथिल हो गये हैंबेमकता गज़लें भी मिल जाती हैंमकता में तख़ल्लुस मिलता है और बिना तख़ल्लुस की असंख्य गज़लेंशे`र कहने के लिए रदीफ़ बांछित माना जाता है, अनिवार्य नहींबेरदीफ अशआर भी प्रचलन हैं

देर से ही सही, आज गज़लें कोठी-कोठे से उतरकर गली-कूंचों में विचरण करती हुई ग्राम-चौपालों तक पहुँच चुकीं हैंमानस की अर्धालियों, घाघ-भड्डरी की कहावतों और निर्गुनियों की साखियों के समान ग़ज़लों के शे`र आमजन की कहन का हिस्सा बन रहे हैंग़ज़लों को अब न आधिकारिक-अनुशंसा की आवश्यकता है और न ‘फ़ारिगुल इस्लाह’ (एक ऐसी अवस्था, जब शागिर्द को अपने उस्ताद से इस्लाह की जरुरत नहीं होती) की वैसे, ग़ज़ल के पक्ष में यदि कुछ करना ही है तो केवल इतना कि इस कोमल-विधा को भाषाई-सांप्रदायिकता की लपटों में झुलसने से बचाया जावे

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

रामचरितमानस में शौर्य

परमात्मा के समस्त लौकिक और आध्यात्मिक मर्यादाओं का साकार विग्रह बनकर, रघुकुल में, राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप मेंअवतरित हुए। लोक और वेद में क्षत्रियों के जिन सात स्वाभाविक गुणों की अनिवार्यता प्रतिपादित की है, यथा-
शौर्यं तेजो धुतिर्दाक्ष्यं युध्दे चाप्य पलायनम।
दानमीश्वर भावश्च क्षात्रकर्म स्वाभाजम।।

(गीता-18/42)
अर्थात शौर्य, तेज, धैर्य, निपुणता, युध्द से न भागना, दानशीलता और ईश्वरीय भाव----वे सभी सार-रूप में राम में समाहित हैं। रामचरितमानस के प्रसंगानुकूल दोहे/अर्धालियाँ महानायक राम का गुणानुवाद तो हैं ही, उन्हें पढ़-सुनकर क्षत्रिय-धर्म और भारतीय-संस्कार भी धन्यता का अनुभव करते हैं।
कहते हैं, जो शूर नहीं वह क्षत्रिय नहीं। दुर्दांत एवं बलवान शत्रु का सामना करते समय भयभीत न होना, न्याययुक्त युध्द करने के लिए सदैव तत्पर रहना और अवसर आने पर साहसपूर्ण तरीके से युध्द करना ही शूरवीरता है। मुनि विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षार्थ गये राम-लक्ष्मण, वहाँ मायावी ताड़का और सुबाहु का वध करते हैं, मारीच बिना फल वाले बान से सौ योजन दूर जा गिरता है।
जनकसभा में शिव-धनुष टूटने पर क्रोधित परशुराम की चुनौती का साहसपूर्ण प्रत्युत्तर देते हुए राम अपनी गौरवशाली वंश-परम्परा और क्षत्रिय-धर्म का भी स्मरण करते हैं-
देव दनुज भूपति भट नाना,
सम बल अधिक होउ बलवाना।
जों रन हमहि पचारै कोऊ,
लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।
क्षत्रिय तनु धरि समर सकाना,
कुल कलंक तेहिं पावर आना।
कहऊ सुभाऊ न कुलहि प्रसंसी,
कालहु डरहिं न रन रघुवंसी।

(बाल/284/1-4)
चित्रकूट में जब भरत सेना सहित प्रभु राम से मिलने आते हैं तब युध्द की संभावना को संज्ञान में लेते हुए लक्ष्मण अकेले ही भरत एवम् उनकी सेना से मुकाबला हेतु तैयार हो जाते हैं। यह अलग बात है कि भरत का मंतव्य व्दंद या युध्द कदापि नहीं था।
तैसिहिं भरतहि सेन समेता,
सानुज निदरि निपताऊ खेता।
जों सहाय कर संकरू आई,&
तों मारऊ रन राम दोहाई। 

(अयोध्या/230/7-8)
खर-दूषण से युध्द में शूरवीरता के साथ-साथ क्षत्रिय धर्म के अन्य गुणों की भी विशद व्याख्या की गई है-
हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं,
तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहिं।
रिपु बलवान देख नहीं डरहीं,
एक बार कालहु सन लरहिं।
जदपि मनुज दनुज कुल घालक,
मुनि पालक खल सालक बालक।
जों न होई बल घर फिरि जाहू,
समर विमुख मैं हतऊ न काहू।
रन चढ़ी करिअ कपट चतुराई,
रिपु पर कृपा परम कदराई।

(अरण्य/19/9-13)
श्री राम की शूरवीरता की प्रशंसा करते हुए मारीच,रावण से कहता है--
जों नर तात तदपि अति सूरा,
तिन्हहि विरोध न आइहि पूरा।

(अरण्य/28/8)
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड,
खर दूषण तिसिरा बधेउ, मनुज कि अस बरिवंड।

(अरण्य/28)
                                                                                                     -सुरेन्द्र सिंह पंवार

इनसे मिली दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाये:
१) ठाकुर वन्शगोपाल सिंह सिसोदिया, राष्ट्रीय अध्यक्ष,
अखिल भारतीय क्षत्रिय धर्म संरक्षण शोध एवम समन्वय संस्थान
२) ठाकुर लख सिंह भाटी, पूनमनगर, जैसलमेर
३) ठाकुर बद्री नारायण सिंह पहाड़ी, मैसूर
४) ठाकुर जितेन्द्र कुमार सिंह, वैशाली (बिहार)
धन्यवाद 

ठाकुर रमेश राघव खुली चुनौती  की सम्पादकीय में लिखते हैं-
एक स्वामीजी वैश्य परिवार में बैठे चर्चा कर रहे थे। उनका कहना था कि प्राचीन काल में स्थापित वर्ण व्यवस्था के दो वर्ण ब्राम्हण और क्षत्रिय तो लगभग समाप्त हो गये हैं। कोई भी अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है। चतुर्थ वर्ण शूद्र का भी लगभग सफाया हो रहा है। कोई भी सेवा नहीं करना चाहता है। पूरा का पूरा समाज वैश्य हो गया है। सोचिये! विचारिये!!