रविवार, 11 मई 2014

जलियाँवाला बाग

प्रसिद्ध कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कविता 'जलियाँवाला बाग में बसंत' बचपन से कंठस्थ है-
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैँ शोर मचाते,
काले-काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। 
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे,
परिमलहीन पराग दाग सा बना पड़ा है, 
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है, 
ओ प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे आना 
यह है शोकस्थान यहॉं मत शोर मचाना। 

और इसीलिए, अधिक उत्सुकता रही, उस बाग, उस शहीद स्थल को देख़ने की-जो स्वर्णमंदिर परिसर से बस कुछ कदम की दूरी पर है। बाग़ के बाहर एवं अंदर देशी-विदेशी सैलानियों की अच्छी ख़ासी भीड़ रही। 
प्रवेश के लिए एक बेहद तंग गलियारा, जिसकी दीवार पट्टिका पर लिख है, यहाँ से अंग्रेज़ जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने गोली चलाने का आदेश दिया था। 

तारीख थी १३ अप्रैल १९१९। प्रवेश के साथ ही शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी। इतना बड़ा नरसंहार, जिसमे १००० व्यक्ति काल कवलित हुए और लगभग २००० व्यक्ति घायल हुए। सूचना पटलों पर लिखी इबारतें बतलाती है कि रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन की योजना बनाते लगभग २०,००० व्यक्ति उस पार्क में थे-वृध्द, महिलाएं और बच्चे भी। दिन बैशाखी का था। इतिहास का यह सत्य है कि जनरल डायर ने अकारण निहत्थों पर गोली चलवाई। कहते हैं १० मिनट में १६५० राउंड गोली चली। 
प्रवेश द्वार के समीप शहीदों की स्मृति में एक अमर ज्योति जलती रहती है, जिसे देखकर आँखें नम हो गयी। प्रणाम करते हुए उन अनाम शहीदों को कृतज्ञता ज्ञापित की जिनके महान बलिदान का प्रतिफल-आज हम स्वतन्त्र है।    
पार्क के मध्य में अमेरिकन डिज़ाइनर बेंजामिन पोक का डिज़ाइन किया स्मारक बना है। और इसी के आसपास सुरक्षित संरक्षित है गोली और खून के निशान। हम सभी कल्पना करने लगे कि एक भीड़ पर अचानक गोलीबारी हो तो प्राण बचाने के लिये लोग कैसे-कैसे भागेंगे? जब कोई रास्ता बाहर निकलने एवं भागने को नहीं मिला तो लोग दस फुट ऊंची दीवार पर चढ़ गये। दीवारों पर ऊँचाई तक उभरे निशान इसकी संपुष्ठि करते हैं। बाग़ में बना कुआँ जो अब बन्द है पर लिखा है कि '१२० शव तो कुँए में मिले'। 
इस हत्याकांड ने समूचे देश में एक दहशत पैदा कर दी। ब्रिटिश एक्ट पालन न करने की स्थिति में अंजाम यहाँ तक हो सकता है। गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने क्षुब्ध होकर 'सर' की उपाधि लौटा दी। उधम सिंह ने लंदन जाकर डायर को गोली मारकर काण्ड का बदला लिया। यह अलग बात है कि वे वहाँ पकडे गये और उन्हें मौत के घाट उतारा गया।  
अंग्रेज़ डायर को अपने इस कृत्य पर कोई पछतावा नहीं रहा। यहाँ तक हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने जनरल डायर की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। श्रद्धा के फूल अर्पित कर हमलोग बाग से बाहर आये परन्तु लगभग सौ वर्ष पूर्व के इन कारुणिक दृश्यों ने हमारे मन मस्तिष्क को झिंझोड़कर रख दिया। 
  

शनिवार, 10 मई 2014

अमृत-सरोवर (सर)

सुबह कुछ विलम्ब से हुई। तैयार होकर १० बजे दुर्गिअना मंदिर पहुँचे। स्वर्ण मंदिर के पैटर्न पर बना मन्दिर, चारोँ तरफ़ सरोवर, उसमेँ तैरती रंग बिरंगी मछलियां, मन्दिर में स्थापित भव्य देव प्रतिमायें और राधाकृष्ण सत्संग द्वारा संकीर्तन से निर्मित भक्तिमय वातावरण। श्रद्धाभाव से ओत-प्रोत हमारा अगला पड़ाव रहा श्री हर मन्दिर साहिब, जिसे श्री दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर भी कहते हैं। सिक्खों का पवित्र एवं केंद्रीय पूजास्थल है।
सिक्खों के पांचवे गुरु श्री अर्जुन साहिब ने इसकी संकल्पना एवं डिज़ाइन की तथा निर्माण करवाया। अमृत-सर नाम उस पवित्र सरोवर के कारण पड़ा जिसका निर्माण १५७० में सिक्खों के तीसरे गुरु रामदास ने स्वयं अपने हाथों से किया था। पूरा स्वर्ण मंदिर सफ़ेद संगमरमर से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गयी है। सिक्ख स्थापत्य-कला का यह बेहतरीन उदाहरण है। दीवारों पर उकेरी इबारतें बतलातीं हैँ कि इस मन्दिर का निर्माण दिसंबर १५८५ से अगस्त १६०४ के मध्य हुआ। इसकी नींव मुस्लिम संत हज़रात मियाँ पीर (लाहौर) ने रखी थी।
काल के थपेड़े खाता यह पवित्र स्थान कई बार क्षतिग्रस्त हुआ परन्तु समर्पित धर्मालम्बियों/कारसेवकों के श्रम से पुन: प्रतिष्ठा स्थापित हो गयी।
शिल्प और सौन्दर्य की अनूठी मिसाल इस मन्दिर की नक़्क़ाशी (इंटीरियर) और बाह्य सुंदरता देखते ही बनती है। गुरुद्वारे के चारों ओर चार दरवाजे हैं जो चारोँ वर्णों के लिये खुले हैं। कट्टरपन्तियों द्वारा जब अनेक मन्दिरों में कुछ जातीयों का प्रवेश वर्जित था, तब यह मन्दिर सर्व-सुलभ था और है।
गुरुद्वारा प्रबन्धन कार्यालय से जानकारी मिली कि यहाँ ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। २२८ कमरे और १८ बड़े हॉल है। साफ़ सुथरी व्यवस्था देखकर लगा कि काश! हमने पूर्व में इंटरनेट पर सर्च किया होता तो यहाँ रुकने का लुफ़्त ले पाते।
सरोवर में लोगों को नहाने/डुबकी लगाने की अनुमति है। सरोवर का पानी लगभग रोज़ बदला जाता है, इसके लिये फिलटरों की व्यवस्था है। पांच से दस वर्षों में पुरे सरोवर की सफ़ाई होती है।
स्वर्णमंदिर परिसर में नंगे सिर प्रवेश की मनाही है। आज दर्शनार्थियों की लम्बी कतार रही। लगभग एक घंटे प्रतीक्षा के बाद पवित्र मन्दिर के गर्भगृह में प्रवेश मिला जहाँ हमने अपने परिजनों सहित पवित्र गुरुग्रंथ साहिब को मत्था टेका और अपना सौभाग्य माना। बाहर आकर अमृत चखा।
स्वर्णमंदिर में आने वाले हर व्यक्ति के लिये यहां लंगर में निःशुल्क प्रसाद की व्यवस्था है। लंगर चौबीस घंटे चलता है। लंगर में खाने-पीने की व्यवस्था गुरुद्वारा प्रबंधन समिति की ओर से नियुक्त सेवादार करते हैं। वे यहाँ आने वाले लोगों (संगत) की सेवा में भी योगदान करते हैं। हमें बतलाया गया कि लगभग ४०,००० लोग प्रतिदिन यहाँ लंगर में भोजन प्रसाद प्राप्त करते है। हमने भी अपने परिजनों सहित लंगर में बैठकर प्रसाद पाया। आत्मा तृप्त हो गयी। धन्यवाद सेवादारों को, प्रबंधन समिति को और वाहेगुरु को। 

शुक्रवार, 9 मई 2014

आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी इस चुनाव में भाग लेने वाली सबसे नयी पार्टी है। एक साल से भी काम समय में इस पार्टी ने उत्थान एवं पतन का स्वाद चखा है। हमारा प्रयास है 'आप' के अब तक के सफ़र पर नज़र डालने की एवं उसके भविष्य की ओर प्रकाश डालने की। अगर आप एक कंपनी होती तो उसका आँकलन भला हम कैसे करते? इसका जवाब देने का प्रयास भी हमने किया है।

Aam Aadmi Party  
प्रस्तुतकर्ता:
धीरेन्द्र मणि शुक्ला
रोहित कडेल
सौरभ कुमार
सौरभ करोड़ी
अभिनंदन पांडे
रोशन कुमार गुप्ता
ऋषि पवार


जस्ट डायल

दिल्ली मीटिंग पॉइंट था। ऋषि लखनऊ से आया, अबीर थाणे से। हम आठ इकठ्ठे होकर अमृतसर को रवाना हुए। हमसे एक चूक हो गयी, शताब्दी के बदले जनशताब्दी का रिज़र्वेशन रहा। धीमी गति, लेट होती ट्रैन और थका देने वाली अंतहीन यात्रा ने घङी की तारीख बदल दी। मौसम भी कुछ नाराज़ था, पानी गिरा, ठंडी हवा चलने लगी।

रास्ते में सहयात्रियों से चर्चा की कि अमृतसर में कहाँ रुकें? उन्होंने बतलाया वीकएंड होने से वहाँ बहुत भीड़ है। स्वर्ण मंदिर में जगह है ही नही, आसपास के हॉटेल भी फुल हैं। रात्रि के १:०० बजे हम परिजनों के साथ कहाँ भटकें! अचानक सौरभ को याद आया 'जस्ट डायल' 8888888888, अपना बजट, यात्री संख्या और लोकेशन बतलाई। तुरंत ही हमारे पास ४-५ हॉटेल के नंबर/नाम एस.एम.एस पर आ गये। हमलोग उन्हें देख ही रहे थे कि एक हॉटेल का कॉल आ गया। चर्चा हुई, हॉटेल का पता और स्टेशन से ऑटो पकडकर पहुँचने की सलाह भी दी। जान में जान आई।

जैसे-तैसे अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। परन्तु वहाँ का नज़ारा कुछ अलग ही दिखा। पानी ने वहाँ की फ़िज़ा ही बिगाड़ दी। सर्वदा पानी ही पानी। विलम्ब से एक ऑटो मिला, परन्तु वह अपने नियत हॉटेल ले जाने ही राज़ी हुआ। ख़ैर उसका मन रखने के लिये हमने दो-तीन हॉटेल देखे। सीमित चॉइस, मनमाफ़िक दरें; रात्रि में नये अजनबी शहर में अपनी मन मर्ज़ी नहीं चल पाती।  ऑटो वाला बार-बार उन्हीं हॉटेल में ठहरने पर ज़ोर दे रहा था। शायद, उसका अपना निजी स्वार्थ रहा। मजबूरन हमें जस्ट डायल पर सम्पर्क हुए नंबर पर ऑटो चालक की बात करानी पडी। वह कुड़कुड़ाता हुआ हमें हमारे नियत ठिकाने पर ले गया। आश्चर्य! जहाँ हम ऑटो चालक से बहस में उलझे थे, उससे चन्द कदमों पर वह हॉटेल था जहाँ हमें जाना था, बड़ा सा, आलीशान।बस, मुख्य सड़क से हटकर लिंक रोड पर था। खैर! हॉटेल पहुँचने पर वहाँ का मैनेजर दरवाजे पर खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था, उसने बताया कि हम लोगों की बातचीत हॉटेल मालिक से हुई थी। उन्हीं का अभी फ़ोन आया था कि जबलपुर से आए हमारे मेहमान हॉटेल पहुँचे अथवा नहीं। थैंक्स! परदेस में इतना रिस्पांस। हॉटेल, वहाँ का मैनेजमेंट, देर रात में खाये गरम-गरम पराठे और सुकून से आयी नींद---याद रहेगी।     

रविवार, 4 मई 2014

दिल्ली राज्य

हमारी ट्रैन फरीदाबाद की सीमा पार कर रही थी, अचानक एक चॅनेज-स्टोन पर पढ़ा "दिल्ली राज्य"। मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ से लेकर अरविंद केजरीवाल तक एक-एक चेहरे घूम गये। कहने को दिल्ली दिल वालों की है, परन्तु यहाँ बादशाहों को भी दो गज ज़मीन दफ़न के लिये नहीं मिली। पूरे देश का संयोजन, नियंत्रण और संचालन दिल्ली से ही होता है। यहाँ कई बार आया गया हूँ। कई-कई दिन कनॉट पैलेस और पालिका बाज़ार में घूमकर बिताए हैं। नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली की समरसता देखी है। परन्तु, इस बार दिल्ली कुछ बदली सी दिखी, डरी सी। सहमी सी!! क्यों? कह नहीं सकता।

हाँ, यह हो सकता है कि पिछली विधान सभा में दिल्लीवासियोँ ने लीक से हटकर भ्रष्टाचार हटाने का वादा करती आप (आम आदमी पार्टी) को विश्वास मत दिया। परन्तु, वे (आप) कसौटी पर कमज़ोर साबित हुए। 'आप' के नेता दिल्ली को बीच मझधार में छोड़कर भाग खड़े हुए। वैसे माना जाता है कि 'आप' सरकार चलाने की अभ्यस्त नहीं थी। आन्दोलन-प्रदर्शन के आदि 'आप' के कार्यकर्ता सत्तासीन होने पर केंचुली नहीं बदल पाये। इसमें कौन दोषी है?

  • दिल्ली का आम मतदाता, जिसने परिवर्तन चाहा। 
  • 'आप' के आलाकमान, जिन्होने दिल्लीवासियों को झुनझुना पकड़ाया, और उसे भी छीन लिया।
  • सत्ता के वे बिचौलिये, जो 'आप' के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधते रहे।  
लेकिन सबसे ज़्यादा दोषी 'आप' के सरगना अरविन्द केजरीवाल ही माने जाएंगे। आनन-फानन दिल्ली राज्य की कुर्सी से पल्लू झटकते हुए पूरे देश पर कब्जा करने का दिवा-स्वप्न देखने लगे। अदूरदर्शीपूर्ण निर्णय! एक प्रदेश जिससे नहीं संभला, वह एक देश को कैसे संभालेगा? दिल्ली वालों ने जोश, जज़्बे, जुनून को वोट दिया था। भ्रष्टाचार के विरुध्द तथाकथित लड़ाई लड़ने वालों को चुना था। डर कर भागने वाले दिल्ली पर शासन नहीं कर पाते, इतिहास साक्षी है।
दूसरे, दिल्ली इसलिए भी सशंकित है कि १६ मई को नयी केंद्रीय सरकार का मुखौटा कौन सा होगा? देश की जनता ने 'वासुकी' और 'तक्षक' के मध्य फैसला किया है, दोनों विषधारी हैँ। भाजपा के नरेन्द्रमोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो सकते हैं (देश में बना मीडियाई प्रसार यही दर्शाता है)। वे गुजरात के विकास का मॉडल लेकर शहर-शहर में जता रहे हैं कि उन्होने गुजरात की कायापलट कर दी; उसी तर्ज पर वे समूचे देश में बदलाव लाएंगे। हो सकता है, उनका मिशन 272+ कामयाब हो। हो सकता है वे और उनके समर्थक उस जादुई आंकड़े को सहजता से पा लें। परन्तु यह किसी व्यक्ति या पार्टी की उपलब्धि नहीं होगी वरन आम जनता का पिछली सरकार की नाकामयाबी पर प्रदर्शित रोष होगा। डर यह भी है कि यदि मोदीजी येन केन प्रकारेण केंद्रीय सत्ता हथिया भी लेते हैं तो-
दिल्ली राज्य का मतदाता/आम आदमी का दिल भी देश के साथ धड़कता है। अभी-अभी दूध से जला था, छाँछ को भी फूँककर पी रहा है। शायद आने वाली १६ मई, एक स्थाई केंद्रीय सरकार दे और दिल्ली वासियों को राज्य के निर्वाचन हेतु पुनः दुविधा की स्थिति से ना गुजरना पड़े। यही सोचते-सोचते नई दिल्ली आ गयी। रेल विभाग की बेहतरीन योजना 'घंटी बजाओ-खाना खाओ' कमसम के टोल फ्री नंबर '11 47-100 100' पर पिछली स्टेशन से लंच बुक किया था। जिसे यहाँ हमारी बर्थ पर सर्व किया गया। हम लोगों ने सुस्वाद भोजन प्राप्त किया। ऋषि लखनऊ से आकर हमें जॉइन कर चुका था। 
हम आगे की यात्रा के लिये निकल पड़े थे।