सोमवार, 16 मार्च 2015

साँसों के सन्तूर

[समीक्षित कृति-साँसों के सन्तूर (दोहा-संग्रह), दोहाकार-आचार्य भगवत दुबे, प्रकाशक-पाथेय प्रकाशन, जबलपुर]
वैसे, दोहा जैसे छोटे-छन्द में काव्य-सृजन का साहस समर्थ कवि भी संकोच से करते हैं। एक तो दोहा के लघु-आकार के कारण “अरथ अधिक अरु आखर थोरे” की अनिवार्यता रहती है, ठीक जिस तरह एक कुशल नट, कुण्डली (छोटे से घेरे) से अपने आप को समेटकर निकल जाता है। दूसरे, दोहा को “लोक” की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। एक सामान्य व्यक्ति भी दोहा पढ़/सुनकर यह कह बैठे—“वाह! कवि ने हमारे मन की बात कह दी।” इस दृष्टि से आचार्य भगवत दुबे एक सफलतम दोहाकार हैं। “साँसों के सन्तूर” उनका छटवां दोहा-संग्रह है। इसके 1038 दोहों को मिलाकर दोहाकार के 12 हजार से ऊपर दोहे प्रकाशित हो चुके हैं, जिनपर विविध शोध-कार्य प्रचलन में हैं।
रागसिध्द दोहाकार दुबेजी ने संयोग के धरातल पर अधिकांश दोहों को संस्कारित किया है। अर्थ, उक्ति-सौन्दर्य और गेयता जैसे गुणों से आप्लावित ये श्रंगारी-दोहे सहृदयों को सहज ही आकर्षण-पाश में बांध लेते हैं। प्रस्तुत दोहे में नायिका का “शरीर-सौन्दर्य” मध्यकालीन “रीति-परम्परा” का स्मरण कराता है–
पंचमुखी रुद्राक्ष से, सुन्दर सारे अंग।
प्रिये तुम्हारे रूप का, अर्चन करें अनंग।।
यही अनुरागी कवि जब रागबोध से युगबोध की ओर मुड़ता है तो बदलते मानव-मूल्य, रुग्ण होतीं हुईं सदभावनाएँ, पश्चिम का अन्धानुकरण, जाति-धर्म और वर्ण पर समाज का विभाजन, साधु-संतों-इमामों का दुहरा चरित्र, प्रदूषित-पर्यावरण इत्यादि से वह व्यथित हो जाता है एवम् ऐसे में उसकी अभिव्यन्जित काव्योक्तियां पाठकों/श्रोताओं को झकझोरतीं हैं, चिन्तन के लिए विवश करतीं हैं—
बहुत गर्म है आजकल, दुल्हों का व्यापार।
लाखों में बिकने लगे, दैनिक चौकीदार।।
अपनी दीर्घ दोहा-यात्रा के उत्तरार्ध में यह वरिष्ठ सृजन-साधक, आस्तिकता-आध्यात्मिकता से प्रभावित लगता है। देखा जावे तो, संग्रह की शुरुआत ही ‘ईश्वर पर विश्वास’ से हुई है—
साईं दीपक राग है, पातक तम हो दूर।
इनकी इच्छा से बजे, साँसों के सन्तूर।।
उक्त शीर्षक-दोहे में-कवि ने आर्य-संस्कृति में वर्णित आश्रम-व्यवस्था के शतायु जीवन (साँसों) की गणना पर आधारित शततंत्री सन्तूर की कल्पना की है, सामान्यतः सूफियाना-संगीत में प्रमुखता से प्रयुक्त इस प्राचीनतम वाद्य में 72 से 90 तार होते हैं। बाबजूद इन सबके, दोहाकार ने “दिशा देने का हितैषी अनिवार्य पक्ष भी ओझल नहीं रहने दिया”- 
वाणी पर संयम रखो, बोलो सोच-विचार।
वाणी से हों आपके, दुश्मन-दोस्त हजार।।
अगर जिन्दगी के दिवस, तुम्हें मिले हों चार।
तो क्यों कर लेते नहीं, सबसे जी भर प्यार।।
इक नन्हें से दीप ने, फैला दिया प्रकाश।
अंधियारे के हो गये, डर कर जर्जर पाश।।
इस एकहजारी दोहा-माला में ठलुए, दडवे, वज्जाद जैसे सामान्य बोल-चाल के शब्द, बेईमानी पुज रही, खेतों में उगने लगे अब लोहे के वृक्ष, पुण्यों की बछिया जैसे नये मुहावरे, शरद की रात में सितारों का चन्द्रमा की बारात लेकर निकलना, जुगनुओं की पूँछ पर् मशालों से घने तिमिर का भाल ठनकना जैसे सुन्दर उपमानों और अन्ना हजारे का आधुनिक-आदर्श (रौल-माडल) में प्रतीकात्मक प्रयोग यह सिध्द करता है कि आचार्य जी अब उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ उन्हें पद-प्रतिष्ठा-पैसा-मान-सम्मान कोई महत्त्व नहीं रखता। वे एक सच्चे कर्मयोगी की भांति साहित्य-साधना रत हैं। वे अपने कमाये अनुभवों और अनुभूतियों को दोनों हाथों से उलीच रहे हैं। उनकी सोच, उनके सामाजिक सरोकार, उनका सत्य के पक्ष में डटकर खड़े रहना और अपनी बात को निर्भीकतापूर्वक कहना-उन्हें कबीर की पांत में बिठा देता है।
और, जैसा कि आचार्य ने आत्मनिवेदित किया है—
रोज कलम घिसते रहे, गोदे पृष्ठ हजार।
दोहा लिख पाया मगर, मुश्किल से दो-चार।।
हम तो यही कहेंगे—“आचार्य जी! धैर्य धारण करें!! यथाशीघ्र, ये ही दो-चार दोहे आम-कहन का हिस्सा बनेंगे, लोगों की जुबान पर थिरकेंगे और तब- आपका श्रम एवम् सृजन सार्थक होगा”।

रविवार, 8 मार्च 2015

(पु.) भ्रूण हत्या

सुबह-सुबह पत्नी मीना और घर की काम वाली बाई के मध्य तेज बातचीत से नींद खुल गई। न जाने! दोनों के बीच किस विषय पर विमर्श चल रहा था? वैसे, बाई तीन-चार दिनों से काम पर नहीं आ रही थी। शायद, वह न आ पाने का स्पष्टीकरण दे रही थी। “एक तो वा एलगिन खूबइ दूर बरत है। गोडे टूट गये जावे-आवे में। मेट्रो पच्चीस रुपइया लेत एक तरफ के, एक आदमी के।”
थोडा-थोडा माजरा समझ आया कि काम वाली की बहू गर्भवती थी। उसे एल्गिन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्रसूति हो चुकी है और सूतक में न आने के कारण वह छुट्टी माँग रही थी। लेकिन आश्चर्य तब हुआ, जब वह बीच-बीच में अपनी बहू को कोस रही थी। “ऐ, बाई-साब! का बतावें। सबरी उम्मीदों पे पानी फिर गओ। ऊपर से चार घरों के काम को हरजा भओ। त्यौहार को टेम हतो। छुट्टी के लाने सबइ बाई-साहिबें नाक-भों सिकोड़त हैं वकीलन बाई ने तो चार दिना के पैसा काट लये। बहुतइ कठोर हें वे!” इसके पहले वह और भला-बुरा कहती, मीना ने उसे टोक दिया कि अभी साहब सो रहे हैं। बाई का स्वर मन्द पड़ गया। मैं फिर सोने की कोशिश करने लगा।
बातचीत लगभग कानाफूसी में बदल गयी थी। तभी ऐसा लगा कि कामवाली रो रही है, मीना उसे समझा रही थी – कामवाली की बुझी-बुझी आवाज ने मुझे बाह्य-बार्तालाप पर कान लगाने के लिए बाध्य कर दिया। बाई कह रही थी—“हमने तो तीसरे महिना डाक्टरी जाँच करवावे को कही हती। पे बहुरानी नहीं मानी, हमइ बात मान लेती तो।” एक झटका सा लगा, मैं बिस्तर से उठ गया, लेकिन मेरी उठने की आहट ने बाई-पुराण पर विराम लगा दिया। मैंने देखा, कि बाई आंगन में बर्तन मांज रही थी; उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। बर्तनों की खडबड़ाहट बता रही थी कि बाई के अन्दर एक ज्वालामुखी दबा है, जो कभी भी फट सकता है। रसोईघर के दरवाजे पर बैठी मीना उसे लड़की और लड़के की बराबरी का दर्शन समझा रही थी और साथ-ही पिछले महीने बर्तनवाला पाउडर ज्यादा खर्च हुआ, उसकी कैफियत भी माँग रही थी। गुसलखाने में जाते-जाते मुझे समझ आ चुका था कि बाई की पतोहू ने लड़की जनी है और शायद, वही आदम-समस्या—लड़के की ललक।
नित्य-क्रियाओं से निवृत होकर जब मैं गुसलखाने से बाहर आया,तब तक बाई काम निपटा कर जा चुकी थी। मीना चाय रखे मेरा इंतजार कर रही थी। उसके चेहरे के आते-जाते भाव यह बता रहे थे कि कोई तो बात है, जो उसे खाये जा रही है। अखबार की तहें अभी खुली नहीं थीं; गोया देश-विदेश की कोई घटना उसकी चिंता का कारण हो, वैसे भी मीना को प्रिन्टिंग इंक की गंध अच्छी नहीं लगती। इसलिए वह बासा अखबार ही पड़ती है। बाई की पोती की खबर इतना संवेदनशील मुद्दा नहीं था; क्योंकि वह लड़की और लड़के में बुनियादी अन्तर नहीं मानती, यहाँ तक कि लड़के और बहू में भी नहीं। फिर क्या, बाई से उसे मोहल्ले-पड़ोस की कोई भेद-भरी खबर मिली हो, जिसे सुनाने की उत्सुकता हो।
चाय की प्रथम चुस्की के साथ मैंने उसकी चुप्पी को तोडा और सीधे-सीधे काम वाली बाई के हाल-चाल पूंछ बैठा। बस! फिर क्या था, बदलते ज़माने और उसके दस्तूरों का हवाला देते हुए उसने रहस्योद्घाटन किया। हुआ यूँ, बाई की बहू को जचकी हेतु सरकारी प्रसूतिकागृह में भर्ती कराया गया। वहाँ अच्छी घडी-बेला में एक स्वस्थ बालक का जन्म हुआ। डिलेवरी नार्मल हुई। कोई मूल या दोष भी नहीं। -“बाई के पोता हुआ। पोती नहीं। फिर भी वह इतनी परेशान क्यों थी?” मेरे पूँछे जाने पर मीना ने बताया ladli laxmi–“कामवाली बाई और उसके घरवाले चाहते थे कि उनकी पुत्रवधू लड़की जने। लड़का नहीं। यदि वह लड़की जनती तो अस्पताल का सारा खर्च, दवा-दारू, एम्बुलेंस, गुड़-बिस्वार, ‘लाडली-लक्ष्मी’ योजना के अंतर्गत लड़की का बीमा,हर महीने उसकी देख-रेख के लिये नगद राशि एवम अलग-अलग सुविधाएँ। लड़की की पढाई-लिखाई, उसकी ड्रेस, उसकी खाना-खुराक, उसके लिए साईकिल। ऊपर से हर महीने स्कालरशिप का पैसा अलग से। यदि लड़की हायर शिक्षा लेना चाहे,तो कोचिंग हेतु लोन-सुविधा, जिसके चुकाने के लिए उसकी या उसके घरवालों की कोई जिम्मेदारी नहीं। वयस्क होने पर उसकी शादी, दहेज़ और कन्यादान की कोई चिंता नहीं। यह सभी उसके मामा मुख्य-मंत्री करते हैं। लड़कियों को बराबरी का हक, दर्जा और नौकरी भी। सरकार निकट भविष्य में ऐसे परिवारों को पेंशन देने पर विचार कर रही है, जिनमें सिर्फ लड़कियां हैं। अब चूंकि लड़का हुआ है, इसलिए कोई अतिरिक्त सुविधाएँ नहीं। गरीबी- रेखा का कार्ड लगाकर जो मिल सका, बस! बाकी गांठ से। कामवाली इसलिए रो रही थी। बता रही थी कि उसका लड़का यह खबर सुनकर बिना जच्चा-बच्चा से मिले मद्रास ट्रक लेकर चला गया, आठ दिनों में लौटेगा। आज अस्पताल से बहू की छुट्टी हुई है, और सास काम पर आ गई। भगवान जाने! क्या करती होगी, वह प्रसूता?”
Ladli Laxmi  Yojna Scheme
चित्र: ladlilaxmi.com 
और, मुझे रह-रह कर कामवाली का बुझा स्वर सुनाई दे रहा था—“हमने तो तीसरे महीना डाक्टरी जाँच करवावे को कही हती, पे बहुरानी नई मानी।” काश! बाई की पतोहू गर्भधारण के तीसरे महीने भ्रूण-परीक्षण करवा लेती और जाँच से जब यह पता चलता कि उसकी कोख में एक बालक पल रहा है- तब, तब क्या बाई और उसके परिजन, गर्भपात करवा देते? (पु.) भ्रूण-हत्या का विचार आते ही मैं विचलित हो गया

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

हमारी लोक संपदा- ईसुरी की फागें

भारत विविधवर्णी लोक संस्कृति से संपन्न, समृद्ध परम्पराओं का देश है। इन परम्पराओं में से एक लोकगीतों की है।

ऋतु परिवर्तन पर उत्सवधर्मी भारतीय जन गायन-वादन और नर्तन की त्रिवेणी प्रवाहित कर आनंदित होते Lok geetहैं। फागुन वर्षांत तथा चैत्र वर्षारम्भ के साथ-साथ फसलों के पकने के समय का सूचक भी है। दक्षिणायनी सूर्य जैसे ही मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायणी होता है इस महाद्वीप में दिन की लम्बाई और तापमान दोनों की वृद्धि होने की लोकमान्यता है। सूर्य पूजन, गुड़-तिल से निर्मित पक्वान्नों का सेवन और पतंगबाजी के माध्यम से गगनचुम्बी लोकानंद की अभिव्यक्ति सर्वत्र देख जा सकती है। मकर संक्रांति, खिचड़ी, बैसाखी, पोंगल आदि विविध नामों से यह लोकपर्व सकल देश में मनाया जाता है।

पर्वराज होली से ही मध्योत्तर भारत में फागों की बयार बहने लगती है। बुंदेलखंड में फागें, बृजभूमि में नटनागर की लीलाएँ चित्रित करते रसिया और बधाई गीत, अवध में राम-सिया की जुगल जोड़ी की होली-क्रीड़ा जन सामान्य से लेकर विशिष्ट जनों तक को रसानंद में आपादमस्तक डुबा देते हैं। राम अवध से निकलकर बुंदेली माटी पर अपनी लीलाओं को विस्तार देते हुए लम्बे समय तक विचरते रहे इसलिए बुंदेली मानस उनसे एकाकार होकर हर पर्व-त्यौहार पर ही नहीं हर दिन उन्हें याद कर 'जय राम जी की' कहता है। कृष्ण का नागों से संघर्ष और पांडवों का अज्ञातवास नर्मदांचली बुन्देल भूमि पर हुआ। गौरा-बौरा तो बुंदेलखंड के अपने हैं, शिवजा, शिवात्मजा, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोभवा आदि संज्ञाओं से सम्बोधित आनन्ददायिनी नर्मदा तट पर बम्बुलियों के साथ-साथ शिव-शिवा की लीलाओं से युक्त फागें गायी जानीं स्वाभाविक है।

बुंदेली फागों के एकछत्र सम्राट हैं लोककवि ईसुरी। ईसुरी ने अपनी प्रेमिका 'रजउ' को अपने कृतित्व में अमर कर दिया। ईसुरी ने फागों की एक विशिष्ट शैली 'चौघड़िया फाग' को जन्म दिया। हम अपनी फाग चर्चा चौघड़िया फागों से ही आरम्भ करते हैं। ईसुरी ने अपनी प्राकृत प्रतिभा से ग्रामीण मानव मन के उच्छ्वासों को सुर-ताल के साथ समन्वित कर उपेक्षित और अनचीन्ही लोक भावनाओं को इन फागों में पिरोया है। रसराज शृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्ष इन फागों में अद्भुत माधुर्य के साथ वर्णित हैं। सद्यस्नाता युवती की केश राशि पर मुग्ध ईसुरी गा उठते हैं-

ईसुरी राधा जी के कानों में झूल रहे तरकुला को उन दो तारों की तरह बताते हैं जो राधा जी के मुख चन्द्र के सौंदर्य के आगे फीके फड़ गए हैं-

कानन डुलें राधिका जी के, लगें तरकुला नीके
आनंदकंद चंद के ऊपर, तो तारागण फीके

ईसुरी की आराध्या राधिका जी सुंदरी होने के साथ-साथ दीन-दुखियों की दुखहर्ता भी हैं-

मुय बल रात राधिका जी को, करें आसरा की कौ
दीनदयाल दीन दुःख देखन, जिनको मुख है नीकौ

पटियाँ कौन सुगर ने पारी, लगी देहतन प्यारी
रंचक घटी-बड़ी है नैयाँ, साँसें कैसी ढारी
तन रईं आन सीस के ऊपर, श्याम घटा सी कारी
'ईसुर' प्राण खान जे पटियाँ, जब सें तकी उघारी

कवि पूछता है कि नायिका की मोहक चोटियाँ किस सुघड़ ने बनायी हैं? चोटियाँ जरा भी छोटी-बड़ी नहीं हैं और आती-जाती साँसों की तरह हिल-डुल रहीं हैं। वे नायिका के शीश के ऊपर श्यामल मेघों की तरह छाईं हैं। ईसुरी ने जब से इस अनावृत्त केशराशि की सुंदरता को देखा है उनकी जान निकली जा रही है।

ईसुर की नायिका नैनों से तलवार चलाती है-

दोई नैनन की तरवारें, प्यारी फिरें उबारें
अलेपान गुजरान सिरोही, सुलेमान झख मारें
ऐंच बाण म्यान घूँघट की, दे काजर की धारें
'ईसुर' श्याम बरकते रहियो, अँधियारे उजियारें

तलवार का वार तो निकट से ही किया जा सकता है नायक दूर हो तो क्या किया जाए? क्या नायिका उसे यूँ ही जाने देगी? यह तो हो ही नहीं सकता। नायिका निगाहों को बरछी से भी अधिक पैने तीर बनाकर नायक का ह्रदय भेदती है-

छूटे नैन-बाण इन खोरन, तिरछी भौंह मरोरन
नोंकदार बरछी से पैनें, चलत करेजे फोरन

नायक बेचारा बचता फिर रहा है पर नायिका उसे जाने देने के मूड में नहीं है। तलवार और तीर के बाद वह अपनी कातिल निगाहों को पिस्तौल बना लेती है-

अँखियाँ पिस्तौलें सी करके, मारन चात समर के
गोली बाज दरद की दारू, गज कर देत नज़र के

इतने पर भी ईसुरी जान हथेली पर लेकर नवयौवना नायिका का गुणगान करते नहीं अघाते-

जुबना कड़ आये कर गलियाँ, बेला कैसी कलियाँ
ना हम देखें जमत जमीं में, ना माली की बगियाँ
सोने कैसे तबक चढ़े हैं, बरछी कैसी भलियाँ
'ईसुर' हाथ सँभारे धरियो फुट न जावें गदियाँ

लोक ईसुरी की फाग-रचना के मूल में उनकी प्रेमिका रजऊ को मानती है। रजऊ ने जिस दिन गारो के साथ गले में काली काँच की गुरियों की लड़ियों से बने ४ छूँटा और बिचौली काँच के मोतियों का तिदाने जैसा आभूषण और चोली पहिनी, उसके रूप को देखकर दीवाना होकर हार झूलने लगा। ईसुरी कहते हैं कि रजऊ के सौंदर्य पर मुग्ध हुए बिना कोई नहीं रह सकता।

जियना रजऊ ने पैनो गारो, हरनी जिया बिरानो
छूँटा चार बिचौली पैरें, भरे फिरे गरदानो
जुबनन ऊपर चोली पैरें, लटके हार दिवानो
'ईसुर' कान बटकने नइयाँ, देख लेव चह ज्वानो

ईसुरी को रजऊ की हेरन (चितवन) और हँसन (हँसी) नहीं भूलती। विशाल यौवन, मतवाली चाल, इकहरी पतली कमर, बाण की तरह तानी भौंह, तिरछी नज़र भुलाये नहीं भूलती। वे नज़र के बाण से मरने तक को तैयार हैं, इसी बहाने रजऊ एक बार उनकी ओर देख तो ले। ऐसा समर्पण ईसुरी के अलावा और कौन कर सकता है?

हमख़ाँ बिसरत नहीं बिसारी, हेरन-हँसन तुमारी
जुबन विशाल चाल मतवारी, पतरी कमर इकारी
भौंह कमान बान से तानें, नज़र तिरीछी मारी
'ईसुर' कान हमारी कोदी, तनक हरे लो प्यारी

ईसुरी के लिये रजऊ ही सर्वस्व है। उनका जीवन-मरण सब कुछ रजऊ ही है। वे प्रभु-स्मरण की ही तरह रजऊ का नाम जपते हुए मरने की कामना करते हैं, इसलिए कुछ विद्वान रजऊ को सांसारिक प्रेमिका नहीं, आद्या मातृ शक्ति को उनके द्वारा दिया गया सम्बोधन मानते हैं:

जौ जी रजऊ रजऊ के लाने, का काऊ से कानें
जौलों रहने रहत जिंदगी, रजऊ के हेत कमाने
पैलाँ भोजन करैं रजौआ, पाछूँ के मोय खाने
रजऊ रजऊ कौ नाम ईसुरी, लेत-लेत मर जाने

ईसुरी रचित सहस्त्रों फागें चार कड़ियों (पंक्तियों) में बँधी होने के कारन चौकड़िया फागें कही जाती हैं। इनमें सौंदर्य को पाने के साथ-साथ पूजने और उसके प्रति मन-प्राण से समर्पित होने के आध्यात्मजनित भावों की सलिला प्रवाहित है।

रचना विधान

ये फागें ४ पंक्तियों में निबद्ध हैं। हर पंक्ति में २ चरण हैं। विषम चरण (१, ३, ५, ७ ) में १६ तथा सम चरण (२, ४, ६, ८) में १२ मात्राएँ हैं। चरणांत में प्रायः गुरु मात्राएँ हैं किन्तु कहीं-कहीं २ लघु मात्राएँ भी मिलती हैं। छंद प्रभाकर नरेंद्र है। इस छंद में खड़ी हिंदी में रचनाएँ मेरे पढ़ने में अब तक नहीं आयी हैं। ईसुरी की एक फाग का खड़ी हिंदी में रूपांतरण देखिए:

किस चतुरा ने चोटी गूँथी, लगतीं बेहद प्यारी
किंचित छोटी-बड़ी न उठ-गिर, रहीं साँस सम न्यारी
मुकुट समान शीश पर शोभित, कृष्ण मेघ सी कारी
लिये ले रही जान केश-छवि, जब से दिखी उघारी

नरेंद्र छंद में एक चतुष्पदी देखिए-

बात बनाई किसने कैसी, कौन निभाये वादे?
सब सच समझ रही है जनता, कहाँ फुदकते प्यादे?
राजा कौन? वज़ीर कौन?, किसके बद-नेक इरादे?
जिसको चाहे 'सलिल' जिता, मत चाहे उसे हरा दे

- संजीव सलिल

सरकार की पहल: LPG सब्सिडी

सरकार द्वारा निर्धारित आधार कार्ड को एलपीजी कनेक्शन से जोड़ने की समय सीमा २८ फ़रवरी को समाप्त हो चुकी है  सरकारी आंकड़ों को माने तो ८० फ़ीसदी एलपीजी धारकों ने इस पहल योजना के तहत अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया
अब आगे क्या? हम ग्राहकों को कैसे पता चले कि सब्सिडी बैंक अकाउंट में जमा हुई है या नहीं?
एक तरीका तो है कि बैंक के स्टेटमेंट से चेक करें इसके अलावा sms द्वारा भी ग्राहकों को सूचित किया जाता है
किन्तु क्या आपको पता है कि एक वेबसाइट में रजिस्ट्रेशन करा के आप आपके द्वारा मुहैय्या किये एलपीजी सिलिंडर का पूरे दो साल का इतिहास देख सकते हैं इसके अलावा इस वेबसाइट पर सिलिंडर बुकिंग, पिछले सिलिंडर के भुगतान संबंद्धि, सब्सिडी के भुगतान की स्थिति आदि की जानकारी भी उपलब्ध है

१. ऑनलाइन अकाउंट बनाने के लिए पहले एलपीजी कम्पनी में कागज़ी कार्यवाही संपूर्ण होनी चाहिए
२. सबसे पहले http://www.mylpg.in/ वेबसाइट पर जाइए अगर आपको अपनी एलपीजी id मालूम है तो उसे दिए हुए स्थान पर अंकित करें

३. अन्यथा अपने एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर (Bharatgas, HP या Indane) के सिलिंडर पर क्लिक करें
४. इसके पश्चात अपने डिस्ट्रीब्यूटर को दिए गए लिस्ट से सेलेक्ट करें, अपना Consumer No (जो आपकी सिलिंडर रिसीप्ट अन्यथा सिलिंडर पुस्तिका में उपलब्ध होगा) डालकर Proceed पर क्लिक करें
५. अब आपको अपना LPG ID ज्ञात हो जाएगा जिसे पुनः http://www.mylpg.in/ साईट पर रिक्त खानों में अंकित करें तथा Submit पर क्लिक करें
६. नए प्रस्तुत पेज पर New User Registration पर क्लिक कर के अपनी सही-सही जानकारी (email id, मोबाइल नंबर आदि) भरें
७. तत्पश्चात रजिस्टर्ड email id पर एक verification मेल आएगा उसमे दिए हुए लिंक पर क्लिक कर के आपका अकाउंट रजिस्टर हो जाएगा
८. दिए हुए email id एवं पासवर्ड से अपने एलपीजी विक्रेता की साईट (दिए हुए चित्र को देखें) पर लॉग इन करें
९. लॉग इन करने पर आपको कई जानकारी एवं सुविधा मिलेगी पेज की बायीं तरफ Subsidy transferred पर क्लिक कर के भुगतान की जा चुकी सब्सिडी की स्थिति ज्ञात हो सकेगी
सरकार की इस पहल का लाभ उठायें  

मंगलवार, 3 मार्च 2015

विक्रम, कि जिनका संवत यहाँ पर चल रहा

अनुश्रुत विक्रमादित्य ईसवी पूर्व 102 से ईसवी 15 तक उज्जैन (भारत) के राजा रहे वे ज्ञान, वीरता और उदारशीलता की व्यक्तित्व-त्रयी थेदेवभाषा (संस्कृत) हो या भारतीय अन्य भाषाएँ, दादी-नानी के किस्से-कहानियां हों या किस्सागोई की अबूझ-पहेलियाँ, चारण-भाटों की बखानी बिरादावालियाँ हों या वाक्यानाविशों की गढ़ी इबारतें, कालपात्र हों या कीर्ति-स्तम्भ-सम्राट विक्रमादित्य की भूरी-भूरी प्रशंसा करते नहीं अघाते
सूबेदार भगवानदीन सिंह सोमवंशी के अनुसार— मालवा का प्रसिध्द राजा गंधर्वसेन था.इसके तीन पुत्रों में शंख अल्पायु में ही मर गया, भरथरी योगी हो गया और विक्रमादित्य गद्दी पर बैठाकथा–सरित्सागर के अनुसार वे, परमार वंश के राजा महेंद्रदित्य के पुत्र थे

विक्रम का वंश-परिचय

वंश—सूर्य वंश
शाखा—परमार
गौत्र-वसिष्ठ
प्रवर-वसिष्ठ, अत्रि, सांकृति
वेद-यजुर्वेद
सूत्र-पारस्कर गृह्यसूत्र
कुलदेवी-कालिका
वृक्ष-पीपल
प्रमुख गद्दी-उज्जैन

सम्राट विक्रमादित्य युद्ध-कला एवम शस्त्र-संचालन में निष्णात थे उनका सम्पूर्ण संघर्षों से भरे अध्यवसायी जीवन विदेशी आक्रान्ताओं, विशेषकर शकों के प्रतिरोध में व्यतीत हुआअंततः ईसा पूर्व 56 में उन्होंने शकों को परास्त किया, शकों पर विजय के कारण वे ‘शकारि’ कहलायेऔर इस तरह ‘विक्रम-युग’ अथवा ‘विक्रम-सम्वत’ की शुरुआत हुईआज भी भारत और नेपाल की विस्तृत हिन्दू परम्परा में यह पंचांग व्यापक रूप से प्रयुक्त होता हैविक्रमादित्य के शौर्य का वर्णन करते हुए समकालीन अबुलगाजी लिखता है— जहाँ परमार विक्रम का दल आक्रमण करता था वहाँ शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते थे और शत्रुदल मैदान छोड़कर भाग जाते

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन थीपुराणों एवम अन्य इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि अरब और मिश्र भी विक्रमादित्य के अधीन थेविक्रमादित्य की अरब-विजय का वर्णन कवि जरहम किनतोई की पुस्तक सायर-उल-ओकुल में हैतुर्की की इस्ताम्बुल शहर की प्रसिध्द लाइब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में यह ऐतिहासिक ग्रन्थ है, उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है–
वे लोग भाग्यशाली है जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम केराज्य में जीवन व्यतीत कियावह बहुत दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था,जो हरेक व्यक्ति के बारे में सोचता थाउसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच में फैलाया अपने देश के सूर्य से भी तेज विव्दानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सकेइन विव्दानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया हैये  विक्रमादित्य के निर्देश पर यहाँ आये
यह शिलालेख हजरत मुहम्मद के जन्म के 165 वर्ष पहले का है

विक्रमादित्य का प्रशस्ति-गान करती दो पुस्तकें आम प्रचलन में हैं-
1.बेताल पच्चीसी (बेताल पञ्चविंशति) इसमें पच्चीस कहानियाँ हैंजब विक्रमादित्य विजित बेताल को कंधे पर लाद कर ले जाने लगे तो बेताल उन्हें एक समस्यामूलक कहानी सुनाता है शर्त रहती है कि उसका समाधान जानते हुए भी यदि राजा नहीं बताएँगे तो उनके सिर के टुकडे-टुकडे हो जायेंगे और यदि राजा बोला तो बेताल मुक्त हो कर पेड़ पर लटक जावेगा राजा ज्ञानवान थे, बुध्दिमान थे, वे समस्या का सटीक समाधान जानते थेकहानियों का सिलसिला यूँ ही, चलता रहता है

2.सिंहासन बत्तीसी (सिंहासन द्वात्रिंशिका) परवर्ती राजा भोज परमार को 32 पुतलियों से जड़ा स्वर्ण-सिंहासन प्राप्त हुआजब वे उस  पर  बैठने लगे तो उनमे से एक-एक कर पुतलियों ने साकार होकर सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, प्रजावत्सलता,वीरता से भरी कहानियाँ सुनाई और शर्त रखी कि यदि वे (राजा भोज) पूर्वज विक्रमादित्य के समकक्ष हैं, तभी उस सिंहासन की उत्तराधिकारी होगें! एम.आई.राजस्वी की पुस्तक राजा विक्रमादित्य के अनुसार, विक्रमादित्य को यह सिंहासन देवराज इंद्र ने दिया, जिसमें स्वर्ग की 32 शापित अप्सराएँ पुतलियाँ बनकर स्थित थीं, जिन्होंने अत्यंत निकट से देखी थी विक्रमादित्य की न्यायप्रियता

सम्राट विक्रमादित्य का सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से ऐसी घटना या स्मारक से जोड़ दिया जाता है, जिसका ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हैजैसे कि, एक बार एक तांत्रिक अष्ट सिध्दियों को प्राप्त करने के लिए सर्वगुण संपन्न विक्रमादित्य की बलि देना चाहता था वह तो भला हो बेताल का, जिसने विक्रमादित्य की न्यायप्रियता से उसे सत्य रहस्य बता दिया बेताल का यह स्वार्थ रहा कि तांत्रिक के मरते ही वह भी मुक्त हो जायेगा राजा विक्रमादित्य ने युक्ति से काम लिया और तांत्रिक का सिर काटकर यज्ञाग्नि के हवाले कर दिया- और राजा को अष्ट-सिध्दियां प्राप्त हो गयीं

विक्रमादित्य स्वयं गुणी थे और विव्दानों, कवियों, कलाकारों के आश्रयदाता थे उनके दरबार में नौ प्रसिध्द विव्दान- धन्वन्तरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, बेतालभट्ट वररूचि और वाराहमिहिर थे, जो नवरत्न कहलाते थेराजा इन्हीं की सलाह से राज्य का संचालन करते थेभविष्य-पुराण में आया है—
धन्वन्तरिः क्षपनकोमरसिंह शंकू बेतालभट्ट घटकर्पर कालिदासः.
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सम्भायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य
धन्वन्तरी औषधिविज्ञान के ज्ञाता रहे,कवि कालिदास राजा के मंत्री रहे और वराह्महिर ज्योतिषविज्ञानी उज्जैन तत्कालीन ग्रीनविच थी, जहाँ से मध्यान्ह की गणना की जाती थीसम्राट वैष्णव थे पर शैव एवम शाक्त मतों को भी भरपूर समर्थन मिला तब, संस्कृत सामान्य बोल-चाल की भाषा रही

विक्रमादित्य के समय में प्रजा देहिक, देविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थी चीनी यात्री फाहियान लिखता है– देश की जलवायु सम और एकरूप हैजनसँख्या अधिक है और लोग सुखी हैं राजधानी उज्जैन की शोभा का वर्णन करते हुए कवि कालिदास ने लिखा है —यह नगर स्वर्ण का एक कांतिमय खंड था, जिसका उपभोग करने के लिए उत्कृष्ट आचरण वाले देवता अपने अवशिष्ट पुण्यों के प्रताप के कारण स्वर्ग त्याग कर पृथ्वी पर उतर आये थे

इतिहास में ऐसे अन्य राजाओं और सम्राटों की चर्चा आती है, जिन्हें विक्रमादित्य का विरुद (टाइटल) लगा या लगाया गया, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमू के नाम से प्रसिध्द है)परन्तु जिन विक्रमादित्य का हम गुणगान कर रहे हैं, वे भारत-भारती (मैथली शरण गुप्त) के अनुसार-

विक्रम कि जिनका आज भी संवत यहाँ पर चल रहा,
ध्रुव-धर्म के ऐसे नृपों का उस समय भी बल रहा
नर रूप रत्नों से सजी थी वीर विक्रम की सभा,
अब भी जगत में जागती है जगमयी जिनकी प्रभा
जाकर सुनो उज्जैन मानो, आज भी यह कह रही,
मैं मिट गई पर कीर्ति मेरी तब मिटेगी जब मही